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भूमाफिया मोती के आगे नतमस्तक था सिस्टम

Ghaziabad Bureau Updated Tue, 17 Apr 2018 05:40 PM IST
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भूमाफिया मोती के आगे नतमस्तक था सिस्टम
गाजियाबाद। एनसीआर के दो सबसे महंगे शहरों में करीब तीन हजार करोड़ रुपये की सरकारी जमीन किसी एक शख्स द्वारा कब्जा करने की कहानी शायद एक पल को गले न उतरे, लेकिन विभिन्न कोर्ट में लंबित वाद इन आरोपों को पुख्ता करते हैं। यह कहानी है एनसीआर के सबसे बड़े भूमाफिया मोती गोयल की। शहर के सबसे महंगे व्यावसायिक क्षेत्र नवयुग मार्केट निवासी और एमएमएच कालेज से स्नातक पास मोती गोयल की नौकरशाह, सफेदपोश से लेकर कर्मचारियों तक गहरी पैठ थी, जिसका लाभ उसने सरकारी जमीनों को कब्जाने के लिए उठाया।
जमीन पर कब्जा करने के लिए उसने हर फार्मूला अपनाया। कहीं पर राजस्व रिकार्ड में हेराफेरी कर संपत्ति अपने व परिजनों के नाम पर दर्ज कराई तो कहीं पर पहले गरीबों के नाम पर पट्टे कराए, जिन्हें बाद में अपने नाम पर ट्रांसफर कर लिया। इस काम में लेखपाल से लेकर एसडीएम और ऊपर तक के अधिकारियों की बड़ी अहम भूमिका रही। मोती गोयल की पहुंच का अंदाजा ऐसे भी लगाया जा सकता है कि सीबीआई टीम ने उसे मॉडल टाउन स्थित एक प्रभावशाली व्यक्ति के घर से निकले वक्त गिरफ्तार किया था। उसके बाद भी कई बड़े अधिकारी व सफेदपोश उसकी पैरवी करने में लगे रहे।

गाजियाबाद व नोएडा में कब्जाई जमीन
सिहानी गेट में वर्ष 2005 में पहली रिपोर्ट दर्ज होने और वर्ष 2006 में सीबीआई को जांच सौंपे जाने के बाद एक के बाद एक खुलासे होते चले गए। जांच हुईं तो नोएडा के दादरी व जेबर में करीब 1400 करोड़ रुपये की सरकारी संपत्ति पर कब्जे कराने का मामला सामने आया। उधर, सीबीआई ने भी गाजियाबाद के अर्थला में वर्ष 2005 में जमीन की कीमत के हिसाब से 502 करोड़ रुपये की 52 हेक्टेयर जमीन कब्जाने के मामले में वर्ष 2008 में चार्र्जशीट पेश की। इसके साथ ही डासना मसूरी में गरीबों के नाम पर पहले पट्टे कराए उसके बाद उन्हें अपने नाम पर करा लिया। जांच में 89 ऐसे पट्टों का खुलासा हुआ। इतना ही नहीं साहिबाबाद औद्योगिक क्षेत्र, साहिबाबाद गांव, कौशांबी, इंदिरापुरम, वैशाली से लेकर पुरानी गाजियाबाद में जमीनी कब्जाई। इन सभी जमीनों की मौजूदा कीमत करीब तीन हजार करोड़ रुपये से अधिक की बताई जाती है, जिनको लेकर कोर्ट में वाद लंबित हैं।

एसडीएम ने दी थी पक्ष में डिक्री
वर्ष 2005 में तत्कालीन एसडीएम सदर पर आरोप लगे थे कि उन्होंने मोती गोयल को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से उसके पक्ष में डिक्री जारी की। इसके बाद तत्कालीन सीओ चिरंजीव सिन्हा ने मामले की जांच की तो रिपोर्ट मे तत्कालीन एसडीएम का नाम सामने आया। रिपोर्ट में नाम आने के बाद लंबे समय तक सीओ और एसडीएम के बीच भी तनातनी का माहौल रहा।

संरक्षण देने पर हुआ निलंबित
तहसील से लेकर आवास विकास और नगर निगम तक मोती गोयल का सिक्का चलता था। जम मामलों का खुलासा हुआ तो उन लोगों पर भी गाज गिरी जिन्होंने सीधे तौर पर कागजों में हेराफेरी करने में उसका साथ दिया था। इस मामले में आवास विकास के तत्कालीन अधिशासी अभियंता सुरेश चंद को वर्ष 2012 में बर्खास्त कर दिया गया। सुरेश चंद्र पर आरोप लगे थे कि वसुंधरा आवास योजना में उसके साथ मिलकर बड़ी गड़बड़ी की थी। उधर, वर्ष 2010 में जांच रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन जिलाधिकारी ह्देश कुमार ने कलक्ट्रेट के तीन बाबुओं को बर्खास्त कर दिया था। बाबु चरण वर्मा, लियाकत अली व हरपाल ने सीधे तौैर पर हेराफेरी करने में मोती गोयल की मदद की थी।

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