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गाजियाबाद रेलवे स्टेशन को चाहिए होम प्लेटफार्म
राजीव शर्मा/अमर उजाला, गाजियाबाद
Updated Thu, 26 Feb 2015 01:18 AM IST
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देश की राजधानी दिल्ली से सटा और यूपी सीमा का पहला ए कैटेगरी रेलवे स्टेशन बदहाल है। यहां राजधानी, दुरंतो जैसी वीवीआईपी ट्रेनों के स्टॉपेज की मांग तो पूरी नहीं हो रही मंत्री जी कम से कम एक अदद होम प्लेटफार्म तो दिला दीजिए।
नोएडा, टीएचए और पुराने गाजियाबाद क्षेत्र के पौने दो लाख यात्रियों का सफर रोज इसी स्टेशन से ही शुरू होता है। होम प्लेटफार्म न होने से यात्रियों में भगदड़ सी मची रहती है।
विकलांग और बीमार यात्रियों को यहां ट्रेन से सफर करना हो तो और फजीहत हो जाती है। जबकि महज एक लाख यात्रियों के फुटफॉल पर मुरादाबाद में और तीन लाख यात्रियों वाले दिल्ली स्टेशन पर भी होम प्लेटफार्म बनाए गए हैं।
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स्टेशन पर होम प्लेटफार्म की मांग 7 साल से उठाई जा रही है। होम प्लेटफार्म हो तो दिल्ली की ओर से कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, मुरादाबाद और बिहार की ओर जाने वाली ट्रेनों को होम प्लेटफार्म से भेजा जा सकता है।
एक लाख से ज्यादा यात्रियों को सीढ़ियां नहीं चढ़नी पड़ेंगी। रेलमंत्री सुरेश प्रभु जी इसकी वजह से अक्सर ट्रेनें छूट जाती है।
होली-दीपावली और वेकेशन में भीड़ बढ़ जाने से सभी प्लेटफार्म के यात्रियों की भीड़ एफओबी पर आ जाने से लोगों को प्लेटफार्म तक पहुंचने में परेशानी झेलनी पड़ती है। एफओबी छोटा होने की वजह से भगदड़ की स्थिति बन जाती है।
विकलांग-बीमार यात्रियों को होती है मुसीबत
विकलांग और बीमार यात्रियों को ट्रेन पकड़नी हो तो फिर सफर से ज्यादा मुसीबत उन्हें पार्किंग से प्लेटफार्म तक पहुंचने में झेलनी पड़ती है।
यहां न तो एस्केलेटर है और न ही लिफ्ट हैं। चार साल पहले 8 करोड़ का बजट पास कर स्टेशन को माडर्न बनाने के काम शुरू किया गया, लेकिन अभी तक यह पूरा नहीं हुआ।
ईएमयू में हों टॉयलेट्स
दिल्ली से टूंडला, अलीगढ़ तक पांच से सात घंटे का सफर लोग ईएमयू से करते हैं। लेकिन इनमें टॉयलेट्स नहीं है। मांग है कि ईएमयू में टॉयलेट्स की व्यवस्था की जानी चाहिए। दो घंटे से ज्यादा लंबे सफर वाले रूट पर ईएमयू की बजाय पैसेंजर ट्रेनों के चलाने की मांग की जा रही है।
मल्टीलेवल पार्किंग की मांग
रेलवे स्टेशन पर प्रतिदिन करीब 2 से 3 हजार वाहन पहुंचते हैं। लेकिन यहां पार्किंग की क्षमता कम है। ऐसे में ऑटो और निजी वाहन बेतरतीब खड़े रहने से यात्रियों को परेशानी झेलनी पड़ती है। मल्टीलेवल पार्किंग इस समस्या का बेहतर विकल्प बन सकती है।
साहिबाबाद स्टेशन भी संवारें
1989 से साहिबाबाद स्टेशन पर कई अन्य ट्रेनों के ठहराव की मांग की जा रही है जो अभी तक पूरी नहीं हुई है। यहां मसूरी एक्सप्रेस, अंबाला इंटरसिटी और शालीमार के स्टॉपेज दिए जाने की मांग है।
10 लाख की आबादी पर एक रिजर्वेशन काउंटर है। यहां वेटिंग रूम का निर्माण, प्लेटफार्म पर शेड निर्माण और स्टेशन को पार कर कालोनियों को जोड़ने के लिए एफओबी की भी जरूरत है।
हाई स्पीड ट्रेनें चलाई जाएं
दिल्ली से हाई स्पीड ट्रेनों के संचालन की शुरूआत हो जाने के बाद अब गाजियाबाद रूट पर भी हाईस्पीड ट्रेनों को चलाए जाने की मांग की जा रही है।
बिहार, बंगाल, असम, महाराष्ट्र और उत्तराखंड के साथ-साथ यूपी के प्रमुख शहरों के लिए हाईस्पीड ट्रेनों का संचालन किया जाना चाहिए।
दिल्ली टू लखनऊ डबल डेकर
आनंद विहार से लखनऊ तक डबल डेकर का लोग लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। हालांकि इसका सफल ट्रायल कर चुका है। बावजूद इसके डबल डेकर का संचालन अभी तक शुरू नहीं हुआ।
एक हो हेल्पलाइन नंबर
ट्रेनों में बढ़ रहे अपराधों से अब देशभर में मदद के लिए एक हेल्पलाइन नंबर जारी करने की मांग उठ रही है। आए दिन जीआरपी और आरपीएफ अलग-अलग हेल्पलाइन नंबर जारी कर देते हैं।
इनको याद रखना मुश्किल है। वहीं सीमा क्षेत्र बदलते ही हेल्पलाइन नंबर भी बदल जाता है। रेलवे इंक्वायरी की तरह देश भर में एक हेल्पलाइन नंबर एक हो जो बार-बार न बदला जाए।
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नोएडा, टीएचए और पुराने गाजियाबाद क्षेत्र के पौने दो लाख यात्रियों का सफर रोज इसी स्टेशन से ही शुरू होता है। होम प्लेटफार्म न होने से यात्रियों में भगदड़ सी मची रहती है।
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विकलांग और बीमार यात्रियों को यहां ट्रेन से सफर करना हो तो और फजीहत हो जाती है। जबकि महज एक लाख यात्रियों के फुटफॉल पर मुरादाबाद में और तीन लाख यात्रियों वाले दिल्ली स्टेशन पर भी होम प्लेटफार्म बनाए गए हैं।
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स्टेशन पर होम प्लेटफार्म की मांग 7 साल से उठाई जा रही है। होम प्लेटफार्म हो तो दिल्ली की ओर से कानपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, मुरादाबाद और बिहार की ओर जाने वाली ट्रेनों को होम प्लेटफार्म से भेजा जा सकता है।
एक लाख से ज्यादा यात्रियों को सीढ़ियां नहीं चढ़नी पड़ेंगी। रेलमंत्री सुरेश प्रभु जी इसकी वजह से अक्सर ट्रेनें छूट जाती है।
होली-दीपावली और वेकेशन में भीड़ बढ़ जाने से सभी प्लेटफार्म के यात्रियों की भीड़ एफओबी पर आ जाने से लोगों को प्लेटफार्म तक पहुंचने में परेशानी झेलनी पड़ती है। एफओबी छोटा होने की वजह से भगदड़ की स्थिति बन जाती है।
विकलांग-बीमार यात्रियों को होती है मुसीबत
विकलांग और बीमार यात्रियों को ट्रेन पकड़नी हो तो फिर सफर से ज्यादा मुसीबत उन्हें पार्किंग से प्लेटफार्म तक पहुंचने में झेलनी पड़ती है।
यहां न तो एस्केलेटर है और न ही लिफ्ट हैं। चार साल पहले 8 करोड़ का बजट पास कर स्टेशन को माडर्न बनाने के काम शुरू किया गया, लेकिन अभी तक यह पूरा नहीं हुआ।
ईएमयू में हों टॉयलेट्स
दिल्ली से टूंडला, अलीगढ़ तक पांच से सात घंटे का सफर लोग ईएमयू से करते हैं। लेकिन इनमें टॉयलेट्स नहीं है। मांग है कि ईएमयू में टॉयलेट्स की व्यवस्था की जानी चाहिए। दो घंटे से ज्यादा लंबे सफर वाले रूट पर ईएमयू की बजाय पैसेंजर ट्रेनों के चलाने की मांग की जा रही है।
मल्टीलेवल पार्किंग की मांग
रेलवे स्टेशन पर प्रतिदिन करीब 2 से 3 हजार वाहन पहुंचते हैं। लेकिन यहां पार्किंग की क्षमता कम है। ऐसे में ऑटो और निजी वाहन बेतरतीब खड़े रहने से यात्रियों को परेशानी झेलनी पड़ती है। मल्टीलेवल पार्किंग इस समस्या का बेहतर विकल्प बन सकती है।
साहिबाबाद स्टेशन भी संवारें
1989 से साहिबाबाद स्टेशन पर कई अन्य ट्रेनों के ठहराव की मांग की जा रही है जो अभी तक पूरी नहीं हुई है। यहां मसूरी एक्सप्रेस, अंबाला इंटरसिटी और शालीमार के स्टॉपेज दिए जाने की मांग है।
10 लाख की आबादी पर एक रिजर्वेशन काउंटर है। यहां वेटिंग रूम का निर्माण, प्लेटफार्म पर शेड निर्माण और स्टेशन को पार कर कालोनियों को जोड़ने के लिए एफओबी की भी जरूरत है।
हाई स्पीड ट्रेनें चलाई जाएं
दिल्ली से हाई स्पीड ट्रेनों के संचालन की शुरूआत हो जाने के बाद अब गाजियाबाद रूट पर भी हाईस्पीड ट्रेनों को चलाए जाने की मांग की जा रही है।
बिहार, बंगाल, असम, महाराष्ट्र और उत्तराखंड के साथ-साथ यूपी के प्रमुख शहरों के लिए हाईस्पीड ट्रेनों का संचालन किया जाना चाहिए।
दिल्ली टू लखनऊ डबल डेकर
आनंद विहार से लखनऊ तक डबल डेकर का लोग लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। हालांकि इसका सफल ट्रायल कर चुका है। बावजूद इसके डबल डेकर का संचालन अभी तक शुरू नहीं हुआ।
एक हो हेल्पलाइन नंबर
ट्रेनों में बढ़ रहे अपराधों से अब देशभर में मदद के लिए एक हेल्पलाइन नंबर जारी करने की मांग उठ रही है। आए दिन जीआरपी और आरपीएफ अलग-अलग हेल्पलाइन नंबर जारी कर देते हैं।
इनको याद रखना मुश्किल है। वहीं सीमा क्षेत्र बदलते ही हेल्पलाइन नंबर भी बदल जाता है। रेलवे इंक्वायरी की तरह देश भर में एक हेल्पलाइन नंबर एक हो जो बार-बार न बदला जाए।