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4 लाख लोगों का जीवन चश्मे पर टिका, 99 फीसदी 15 से 30 साल के

Mon, 02 Dec 2019 05:46 PM IST
पूजा त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Mon, 02 Dec 2019 05:46 PM IST
सार

- दृष्टि के अलावा अन्य संवेदी हीन के मामले भी आ रहे सामने
- 15 से 30 वर्ष की आयु के बीच ही मिल रहे मरीज
- 2017 में 125 लोगों की मौत के पीछे एक वजह कमजोर दृष्टि भी
- सबसे ज्यादा बेटियों की आंखें मिल रहीं जन्म से कमजोर

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four lakh people depend on spectacles out which 99 percent are between 15 and 30 age group
गोल्डन चश्मा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

दिल्ली के 4 लाख लोगों का जीवन उनके चश्मे पर टिका है। अगर इनमें से कोई भी अपना चश्मा भूल जाए तो वह अपनी आंखों से सही देख भी नहीं सकता। गौर करने वाली बात है कि चश्मा यानि कमजोर दृष्टि 15 से 30 साल तक की आयु के लड़कों में मिल रही है।

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हाल ही में सामने आई भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में दृष्टि व अन्य संवेदी हीन की समस्या से 4,03,332 लोग ग्रस्त हैं इनमें से लगभग 99 फीसदी स्कूल और कॉलेज जाने वाले छात्रों के अलावा नौकरी पेशा वाले युवा शामिल हैं।
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वर्ष 2017 में दिल्ली के करीब 125 लोग ऐसे भी थे, जिनकी मौत के पीछे एक वजह कमजोर दृष्टि भी थी। इनमें से 60 पुरुष व 65 महिलाएं शामिल थीं। इतना ही नहीं दिल्ली में सबसे ज्यादा बेटियों की आंखें जन्म से कमजोर मिल रही हैं। 4 वर्ष तक की आयु वाली 8,913 बेटियां वर्ष 2017 में कमजोर दृष्टि पीड़ित मिली हैं। 

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एम्स के नेत्ररोग विशेषज्ञ डॉ. रोहित का कहना है कि भारत में दृष्टिहीनता के मामलों में लगातार कमी देखने को मिल रही है लेकिन शहरी क्षेत्रों में युवाओं में रोशनी कम की परेशानी भी एक चुनौती है। इसके पीछे खानपान से लेकर उनकी जीवनशैली या आनुवांशिकता जैसे कई कारण हो सकते हैं। 

वहीं नेत्ररोग विशेषज्ञ डॉ. राहिल चौधरी का कहना है कि जीवनशैली के साथ साथ लोगों में जागरुकता का अभाव इसे बढ़ावा दे रहा है। बहुत से लोग एक बार नेत्रजांच कराने के बाद कई वर्ष तक उसका ध्यान ही नहीं रखते हैं।

स्कूल और कॉलेज जाने वाले छात्र कम रोशनी में पढ़ाई सहित अपने रोजमर्रा के काम करते हैं जिससे उनकी आंखों पर जोर पड़ता है। इसलिए डॉक्टर समय समय पर स्क्रीनिंग की सलाह देते हैं। 

डॉक्टरों के अनुसार दिल्ली में प्रवासी मजदूरों की संख्या काफी ज्यादा है। आर्थिक रुप से कमजोर होने के कारण इनका खानपान बेहद कमजोर होता है और ये स्वास्थ्य जांच सेवाओं तक भी नहीं पहुंच पाते हैं। इनका कहना है कि उपचार और जांच उपलब्ध होने के बाद भी इसका लाभ नहीं ले पा रहे हैं।

अभिभावकों को बच्चों की संतुलित जीवनशैली और मोबाइल, टीवी इत्यादि को उनसे दूरी पर रखने, कम रोशनी में पढ़ाई नहीं करने, समय समय पर नेत्रजांच इत्यादि की सलाह है।

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