दिल्ली में कुर्सी के लिए चाहिए चालीस फीसदी वोट
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दिन शनिवार, तारीख 7 फरवरी। चुनाव आयोग की कोशिश है कि मतदान प्रतिशत बढ़े जिसके लिए जागरूकता अभियान और सुविधाएं भी बढ़ाईं। मतदान प्रतिशत में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की जुगत में राजनीतिक दल जुटे हैं।
चुनाव विश्लेषक बताते हैं कि जितने वोट पड़ते हैं, उसमें 40 फीसदी वोट पाने वाली पार्टी सरकार बनाती है। मतदान प्रतिशत बढ़ने पर भाजपा को अधिक सीटें मिलती हैं। पिछले चुनाव में कोई दल 40 फीसदी तक नहीं पहुंचा, जिसका नतीजा अल्पमत की सरकार, राष्ट्रपति शासन और फिर चुनाव की नौबत सामने है।
विधानसभा चुनाव 1993 में मतदान 62 फीसदी हुआ, जिसमें भाजपा की हिस्सेदारी 43 फीसदी रही। भाजपा को 51 सीटें मिली और पूर्ण बहुमत से सरकार बनी। कांग्रेस को 34 फीसदी वोट और 14 सीटें मिली। त्रिकोणीय मुकाबला भी कई जगह हुआ, जिसमें जनता दल से शोएब इकबाल और मतीन अहमद जीते। तीन निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे।
1998 में पलट गया था पासा
1998 के चुनाव में मतदान का प्रतिश 49 रहा और पासा पलट गया। कांग्रेस को 49 फीसदी वोट और 47 सीटें मिलीं। भाजपा को 34 फीसदी वोट के बावजूद सिर्फ 11 सीट पर संतोष करना पड़ा।
जनता दल से शोएब इकबाल, निर्दलीय मतीन अहमद और बदरपुर से रामसिंह नेताजी ने जीत दर्ज की। 2003 में भी मतदान का प्रतिशत 53 रहा। कांग्रेस को 48 फीसदी वोट के साथ 48 सीटें मिल गईं। भाजपा को 35 फीसदी वोट मिले, लेकिन सीटें 20 ही मिलीं।
विधानसभा चुनाव 2008 में 58 फीसदी मतदान हुआ, जिसमें कांग्रेस को 40 फीसदी वोट के साथ 43 सीटें मिलीं। भाजपा को इस चुनाव में भी 36 फीसदी वोट मिले, लेकिन 23 प्रत्याशी ही जीते। इस चुनाव में बसपा को 14 फीसदी वोट और दो सीटें मिलीं। वहीं पिछले चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़कर 65.6 हो गया।
जहां बदलाव तो हुआ, लेकिन किसी दल को 40 फीसदी वोट नहीं मिले। भाजपा को फिर 33 फीसदी वोट और 31 सीटें मिलीं, आम आदमी पार्टी को 29 फीसदी वोट पर 28 सीटें और कांग्रेस को 24 फीसदी वोट के साथ सिर्फ 8 सीटें मिलीं।