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डीएनए साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर एम्स ने उठाए सवाल, कहा- 90 फीसदी परिणाम नहीं होता सही

Thu, 18 Jul 2019 06:29 AM IST
देव कश्यप न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Thu, 18 Jul 2019 06:29 AM IST
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Forensic experts of AIIMS Says 90% DNA samples result  will not be accurate
एम्स - फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)

अपराध की जांच के लिए अब तक सबसे पुख्ता माने जाने वाले डीएनए साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर एम्स के फोरेंसिक विभाग के प्रमुख डॉ. सुधीर गुप्ता ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान हालातों को देखकर 90 फीसदी तक डीएनए साक्ष्यों की जांच के परिणाम सही नहीं होते। बुधवार को नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित एक परिचर्चा में डॉ. गुप्ता ने कहा कि योनि-पदार्थ (वेजाइनल स्वैब) और वीर्य नमूनों का शीघ्रतापूर्वक विश्लेषण कर दोषी को पकड़ने में मदद मिल सकती है, लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि लगभग 80 से 90 फीसदी नमूनों के ठोस नतीजे नहीं निकलते।

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इसके पीछे डॉ. गुप्ता भारत में डीएनए सैंपल के संग्रह और उनकी सीलिंग सही से नहीं हो पाने को मुख्य वजह मानते हैं। उन्हें अनुपयुक्त तापमान में भंडारित करना भी एक कारण है। इसलिए उनका मानना है कि देश में एक वन-स्टेप यौन उत्पीड़न जांच, देखभाल व अनुसंधान केंद्रों पर सरकार को ध्यान देना चाहिए, जहां डीएनए संग्रह व परीक्षण सुविधाओं की अत्याधुनिक तकनीक से लैस हो।
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राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, देश में सालाना करीब 40 हजार दुष्कर्म मामले दर्ज किए जा रहे हैं। इनमें से 20 से 30 फीसदी मामले ऐसे हैं, जिनमें पीड़िता को गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया है। फोरेंसिक विशेषज्ञों की मानें तो अस्पताल में दुष्कर्म पीड़िता को पोस्ट ट्रॉमा देखभाल की जरूरत होती है, जो वर्तमान में देश के ज्यादातर अस्पतालों में सही तरह से नहीं हो पा रही। 

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दिल्ली के रोहिणी स्थित एफएसएल के निदेशक डॉ. वर्मा का मानना है कि वन-स्टॉप यौन उत्पीड़न जांच और देखभाल केंद्रों का निर्माण सही दिशा में उठाया गया एक कदम है। उन्होंने कहा- ‘हमने डीएनए परीक्षण की मांग में काफी वृद्धि देखी है और अनुसंधानकर्ताओं की मदद करने के लिए हम अपनी क्षमता को बढ़ा रहे हैं। फोरेंसिक साक्ष्य को शीघ्रतापूर्वक हासिल करने, उचित संग्रह व संरक्षण के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित अपराध-स्थल जांच टीम का गठन करने की योजना बना रहे हैं।’

मुंबई के केईएम अस्पताल के फोरेंसिक विभागाध्यक्ष डॉ. हरीश पाठक का मानना है कि, उनके यहां हर वर्ष यौन उत्पीड़न के लगभग 200 मामले आते हैं, लेकिन परामर्श, मेडिकल जांच व पीड़िता के ठहरने के लिए निर्धारित विशेष स्थान की कमी रहती है। इसलिए उन्होंने वन-स्टॉप सेंटर का निर्माण किया है, जहां फोरेंसिक मेडिसिन, गायनोकोलॉजी, मनोचिकित्सा के विशेषज्ञों के साथ मिलकर विवरण व इलाज देते हैं। एक हालिया अनुमान के मुताबिक, अपराध स्थल के साक्ष्य से विकसित काफी डीएनए प्रोफाइल एक वर्ष में दोगुने हुए हैं। वर्ष 2017 में 10 हजार मामलों से बढ़कर वर्ष 2018 में करीब 20 हजार से ज्यादा हुए हैं।

देश का पहला राष्ट्रीय नोडल केंद्र बनेगा एम्स
दुष्कर्म पीड़िताओं को लेकर एम्स में तैयार हो रहे वन स्टॉप केंद्र के जरिये पीड़िताओं को चिकित्सा के अलावा कानूनी सलाह, मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग, डीएनए जांच इत्यादि सुविधाएं मिल सकेंगी। इसके लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय भी सहयोग कर रहा है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को प्रस्ताव भेजा है। बताया जा रहा है कि ये देश का पहला राष्ट्रीय नोडल केंद्र बनेगा, जिसके जरिये पुलिस को डीएनए जांच में काफी मदद मिलेगी। एम्स में ये केंद्र पूरी तरह से तैयार होने के बाद सभी राज्यों में भी इसे लाने का प्रस्ताव है। देश के सभी वन स्टॉप केंद्रों को एक मंच पर लाने और एम्स की ओर से इसकी निगरानी रखी जाएगी।

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