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मौत के करीब पहुंचा रहा कबूतर: दाना डालने से लोगों के स्वास्थ्य को भारी खतरा, सांस के जरिए फैलता है संक्रमण

Sat, 27 Dec 2025 07:21 PM IST
विकास कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: विकास कुमार Updated Sat, 27 Dec 2025 07:21 PM IST
सार

22 दिसंबर को मुंबई हाई कोर्ट ने दादर के एक व्यवसायी पर सार्वजनिक जगह पर कबूतरों को दाना डालने पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया। विशेषज्ञों के अनुसार, कबूतरों की बीट (मल) और पंखों में कई तरह के फंगस और बैक्टीरिया पनपते हैं, जो सूखकर हवा में उड़ जाते हैं, जिससे सांस के जरिए संक्रमण फैलता है।

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Feeding pigeons poses a threat to people health
कबूतर फैला रहे बीमारी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

लंबे समय से भारतीय संस्कृति में कबूतरों को दाना डालना पुण्य का कार्य माना जाता रहा है। पार्कों, चौकों और छतों पर लोग रोजाना अनाज बिखेरकर पक्षियों को खिलाते हैं। मान्यता है कि इससे अच्छे कर्म होते हैं और मन को शांति मिलती है। लेकिन, अब यह परंपरा स्वास्थ्य विशेषज्ञों और सरकारी एजेंसियों के निशाने पर है। ऐसे में 22 दिसंबर को मुंबई हाई कोर्ट ने दादर के एक व्यवसायी पर सार्वजनिक जगह पर कबूतरों को दाना डालने के लिए 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया। अदालत ने इसे मानव जीवन के लिए खतरा करार देते हुए कहा कि यह बीमारियां फैलाने वाला कृत्य है। इसी तरह कर्नाटक सरकार ने दिसंबर में सार्वजनिक स्थानों पर कबूतरों को खिलाने पर पूर्ण प्रतिबंध की घोषणा की, जबकि दिल्ली नगर निगम भी ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर रहा है।

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सांस के जरिए फैलता है संक्रमण
यह मामला दिल्ली में भी बहुत समय से गरमाया हुआ है। इसको लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने दिल्ली सरकार, पीडब्ल्यूडी, एमसीडी और एनडीएमसी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था। हालांकि, एनजीटी के नोटिस के बाद एमसीडी ने अगस्त 2025 में सार्वजनिक जगहों पर कबूतरों को दाना खिलाने पर एक दिशा-निर्देश जारी किया था। लेकिन, यह सख्त प्रतिबंध नहीं है। दिल्ली में अभी तक कोई कानूनी प्रतिबंध लागू हुआ है। वहीं, विशेषज्ञों के अनुसार, कबूतरों की बीट (मल) और पंखों में कई तरह के फंगस और बैक्टीरिया पनपते हैं, जो सूखकर हवा में उड़ जाते हैं। इनसे सांस के जरिए संक्रमण फैलता है।

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फेफड़ों से लेकर दिमाग तक में घुस रहा संक्रमण
विशेषज्ञों के अनुसार, इससे होने वाली प्रमुख बीमारियों में से एक हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस (पिजन ब्रीडर्स लंग) है, जो फेफड़ों में सूजन और स्कारिंग कर देता है, जिससे सांस लेने में दिक्कत पैदा करती है। देश में यह इंटरस्टिशियल लंग डिजीज का सबसे आम कारण है। इसके अलावा, क्रिप्टोकोकोसिस (फंगस से होने वाला संक्रमण), जो फेफड़ों से दिमाग तक पहुंच सकता है। एक अन्य बीमारी में से हिस्टोप्लास्मोसिस (फंगल इंफेक्शन) होने का भी खतरा है, जो फ्लू जैसे लक्षणों से शुरू होकर गंभीर हो जाता है। वहीं, सिटाकोसिस (पैरट फीवर) एक बैक्टीरियल संक्रमण, जो निमोनिया जैसा बन जाता है।

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परंपरा बनाम स्वास्थ्य के तहत बढ़ रहा विवाद
पर्यावरणविद् संजय मिश्रा ने बताया कि एक तरफ धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं हैं, जहां कबूतरों को खिलाना अच्छे कर्म से जोड़ा जाता है। जैन समुदाय और कई लोग इसे जीव दया का प्रतीक मानते हैं। लेकिन दूसरी तरफ डॉक्टर और सरकारी एजेंसियां जागरूकता अभियान चला रही हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का सुझाव है कि अगर खिलाना ही है तो नियंत्रित तरीके से, दूरस्थ इलाकों में या निर्धारित जगहों पर खिलाए। सार्वजनिक पार्कों और सड़कों पर प्रतिबंध जरूरी है ताकि शहर स्वच्छ और सुरक्षित रहें।

बच्चों, बुजुर्गों और सांस की बीमारी वाले लोगों को ज्यादा खतरा
पल्मोनोलॉजिस्ट विभाग के डॉक्टरों ने बताया कि मुंबई जैसे शहरों में कबूतरों की आबादी अनियंत्रित खिलाने से 150 प्रतिशत बढ़ चुकी है, जिससे बीट का एकत्रित होना स्वास्थ्य संकट पैदा कर रहा है। यह बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस की बीमारी वाले लोगों के लिए यह सबसे खतरनाक है। हाल के मामलों में दिल्ली में एक बच्चे की मौत भी इसी कारण हुई थी।

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