Harish Rana: मरकर भी जिंदगी बांट गए हरीश राणा, किसी के दिल में धड़केंगे; दुनिया देखेंगी उनकी आंखें
अब कई जिंदगियों को नई उम्मीद मिलेगी। यह सिर्फ एक विदाई नहीं, बल्कि त्याग, साहस और इंसानियत की ऐसी कहानी है, जो हर दिल को छूकर आंखें नम कर देती है।
विस्तार
असहनीय दर्द सहते हुए 13 साल बाद हरीश राणा इस दुनिया से विदा जरूर हो गए, लेकिन उनके माता-पिता ने अपने बेटे को अमर बनाने का ऐसा फैसला लिया है, जो दर्द को भी एक नई रोशनी देगी। आंसुओं से भरी आंखों के बीच उन्होंने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान करने का निर्णय लिया, ताकि किसी और की धड़कनों में उनका बेटा जिंदा रह सके और किसी की अंधेरी दुनिया में फिर से उजाला लौट सके, जिस घर में सन्नाटा पसरा है। वहीं, से अब कई जिंदगियों को नई उम्मीद मिलेगी। यह सिर्फ एक विदाई नहीं, बल्कि त्याग, साहस और इंसानियत की ऐसी कहानी है, जो हर दिल को छूकर आंखें नम कर देती है।
भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति पाने वाले पहले शख्स हरीश राणा का एम्स में मंगलवार को शाम 4:10 बजे निधन हो गया। वह पिछले 13 साल से कोमा में थे। हरीश राणा को 14 मार्च को गाजियाबाद स्थित उनके घर से एम्स के कैंसर अस्पताल की देखभाल यूनिट में लाया गया था। सूत्रों के अनुसार, उनके माता-पिता की सहमति से एम्स में उनकी दोनों आंख के कॉर्निया व हृदय के वाल्व दान किया गया गया। हालांकि, एम्स के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि हरीश का हृदय, किडनी व लिवर दान नहीं हो सकता था। लेकिन, परिवार की सहमति से दोनों कॉर्निया व हृदय के चारों वाल्व लेकर सुरक्षित रख दिया गया है। इसके बाद पार्थिव शरीर परिजनों को सौंप दिया गया है। हरीश के परिजनों ने उनकी मौत के बाद हरीश के क्रियाशील अंगों को दान करने की इच्छा जताई थी।
बेसुध बेटे को घर की हर बात बताती थी हरीश राणा की मां
हरीश राणा की मां ने अपने बेटे की हालत को लेकर भावुक करते हुए बताया कि वह लंबे समय से बेसुध था और अपनी पीड़ा भी व्यक्त नहीं कर पाता था। उन्होंने कहा कि एक मां के लिए इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है कि उसका बच्चा अपनी तकलीफ तक न बता सके। उन्होंने बताया कि वह रोज सुबह-शाम उसकी मालिश करती थी और उसे घर की सारी बातें सुनाती थीं। आज क्या हुआ, कौन आया, क्या-क्या हुआ। कई बार घंटों तक इंतजार करती रहती थी कि वह एक बार पलक झपका दे, ताकि मुझे लगे कि उसने मेरी बातें सुन लीं। उन्होंने कहा कि बेटे की छोटी-छोटी हरकतें ही उनके लिए सुकून का सहारा थीं। कभी उसे उबासी आती, कभी छींक आती या आंखों के आसपास की त्वचा फड़कती, तो हमें उसी से यह एहसास होता था कि वह जिंदा है। हरीश राणा की मां ने कहा कि अब जब उसके जीवन की अंतिम घड़ियां आ पहुंची हैं, तो उनके लिए यह स्थिति बेहद कठिन है।
टीम में थे ये विभाग शामिल
इससे पहले मरीज की देखभाल को लेकर डॉक्टर पूरी तरह सतर्क थे। एम्स की पूर्व ऑन्को-एनेस्थीसिया प्रमुख डॉ सुषमा भटनागर ने बताया था कि इस प्रक्रिया में मरीज को दिए जाने वाले पोषण को धीरे-धीरे कम किया जाता है या बंद किया जाता है। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाता है कि उसे किसी प्रकार का दर्द न हो। इसके लिए लगातार दर्द निवारक दवाएं दी जाती हैं, ताकि मरीज को आराम मिले और उसे किसी तरह की पीड़ा महसूस न हो। इस पूरी प्रक्रिया को लागू करने के लिए डॉक्टर सीमा मिश्रा के नेतृत्व में एक विशेष मेडिकल टीम गठित की गई थी। इस टीम में न्यूरोसर्जरी, ऑन्को-एनेस्थीसिया, पेलिएटिव मेडिसिन और मनोचिकित्सा विभाग के विशेषज्ञ शामिल थे।
हरीश राणा का इमोशनल वीडियो हुआ था वायरल
एम्स ले जाने से पहले हरीश राणा के गाजियाबाद स्थित घर से एक भावुक दृश्य सामने आया था, जिसने लोगों को प्रभावित किया। वायरल हुए वीडियो में ब्रह्मा कुमारी संस्था की एक महिला सदस्य उनके माथे पर तिलक लगाते हुए नजर आती हैं और बेहद शांत स्वर में उनसे कहती हैं कि सभी को क्षमा करते हुए और सबसे माफी मांगकर अब शांति से विश्राम करें। इस दृश्य ने देखने वालों की आंखें नम कर दी थीं।
इच्छामृत्यु को लेकर क्या है नियम?
2018 में पैसिव यूथेनेशिया को वैधता देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए 2 तरह के नियम बनाए…
1. जब मरीज ने पहले ही लिविंग विल लिख रखी हो: जब मरीज ने मेंटली फिट रहते हुए अपनी इच्छा से लिविंग विल लिखी हो। इस लिविंग विल में साफ तौर पर लिखा जाता है कि मरीज की बीमारी अगर लाइलाज हो जाए यानी अगर वह अब कभी ठीक होने लायक न बचे तो उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटा दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए भी कुछ नियम बनाए है।
- 18 साल से ज्यादा उम्र और स्वस्थ व्यक्ति ही लिविंग विल लिख सकता है। मरीज ने 2 गवाहों के सामने लिविंग विल साइन की हो। डॉक्यूमेंट्स को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने वेरिफाई किया हो।
- इलाज करने वाले डॉक्टर, हॉस्पिटल के मेडिकल बोर्ड और जिला स्तर के एक बाहरी मेडिकल बोर्ड की मंजूरी ली गई हो। दोनों बोर्डों की मंजूरी मिलने के बाद वेंटिलेटर जैसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम को बंद किया जा सकता हो।
- इस पूरी प्रक्रिया के बारे में परिवार को जानकारी दी जाती है। किसी भी तरह के विवाद की स्थिति में हाईकोर्ट में अपील की जा सकती है।
2. जब कोई लिविंग विल न हो: जब मरीज अपने होश में रहते हुए लिविंग विल नहीं बनाता तो उसका परिवार या करीबी ये फैसला ले सकते हैं। हालांकि, ये इतना आसान नहीं है। इसके लिए 2018 में सुप्रीम कोर्ट के बनाए गए इन नियमों का पालन करना होता है।
- अस्पताल के डॉक्टरों का एक बोर्ड मरीज की कंडीशन चेक कर रिपोर्ट बनाता है। कलेक्टर 3-5 एक्सपर्ट्स का दूसरा मेडिकल बोर्ड बनाते हैं, जो ये रिपोर्ट चेक करता है। दोनों बोर्ड के सहमत होने पर इस फैसले को ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पास भेजा जाता है। मजिस्ट्रेट मरीज से मिलकर आखिरी निर्णय लेते हैं। अगर इसमें किसी तरह की विवाद की स्थिति होती है, तो हाइकोर्ट में अपील की जा सकती है।
इच्छामृत्यु के दो तरीके
पैसिव यूथेनेशिया: इसमें मरीज का इलाज या लाइफ सपोर्ट जैसे वेंटिलेटर, फीडिंग ट्यूब या दवाइयां रोक दी जाती हैं, ताकि उसकी मौत प्राकृतिक रूप से हो सके। इसमें डॉक्टर कोई नया काम नहीं करते, सिर्फ इलाज बंद कर देते हैं। मौत का कारण बीमारी ही रहती है।
एक्टिव यूथेनेशिया: इसमें मरीज को मौत देने के लिए डॉक्टर दवाई या इंजेक्शन का इस्तेमाल करते हैं। भारत में यह गैर-कानूनी है। अगर कोई जान-बूझकर किसी मरीज को दवाई देकर मारता है, तो इसे बीएनएस की धारा के तहत हत्या या के तहत आत्महत्या में मदद माना जाता है।