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समाधान: मां के साथ 'ममता' भी रहेगी सुरक्षित, एम्स में कैंसर पीड़ित महिला का सुरक्षित रखा जा रहा है भ्रूण
Tue, 13 Sep 2022 02:16 AM IST
Vikas Kumar
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Vikas Kumar
Updated Tue, 13 Sep 2022 02:16 AM IST
सार
कैंसर इलाज के दौरान महिलाओं की प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है। दवाओं के असर से अंडाणु कमजोर पड़ जाते हैं। इससे कई बार महिलाएं शुरुआती चरण में इलाज शुरू करने से बचती हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : iStock
विस्तार
कैंसर पीड़ित महिला अब खुद के जीवन के साथ उस 'ममता' यानी भविष्य की संतान को भी सुरक्षित रख पाएगी, जिसके चलते अभी तक वह अपनी जान को भी जोखिम में डालने के लिए तैयार रहती है। देश के सर्वोच्च संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली ने ऐसे कैंसर पीड़ित महिला की भविष्य की चिंता का समाधान निकाल लिया है, ताकि भविष्य की संतान के लिए वो कैंसर की दवा से परहेज न करें, जिसे खाने के बाद प्रजनन क्षमता घट या समाप्त हो जाती है।
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दरअसल, कैंसर इलाज के दौरान महिलाओं की प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है। दवाओं के असर से अंडाणु कमजोर पड़ जाते हैं। इससे कई बार महिलाएं शुरुआती चरण में इलाज शुरू करने से बचती हैं। बाद में यह उनकी जान पर बन आती है। एम्स ने इस तरह की महिलाओं को बड़ी राहत दी है। इलाज शुरू करने से पहले ही अब अस्पताल में भ्रूण सुरक्षित रखने की सुविधा शुरू की।
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एम्स के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की वरिष्ठ डॉक्टर नीना मल्होत्रा के मुताबिक, कैंसर ठीक होने के बाद भ्रूण महिला में डाल दिया जाता है। इससे वह सुरक्षित तरीके से मां बन सकती है। एम्स में पिछले चार सालों में कैंसर से जुड़े ऐसे 30 मरीजों का भ्रूण सुरक्षित रखा गया। इनमें से तीन महिलाएं इस विधि से मां भी बनी हैं।
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बच्चों तक नहीं पहुंच पाता कैंसर
डॉ. नीना मल्होत्रा ने कहा कि जेनेटिक कैंसर होने की आशंका के बावजूद इस विधि से बच्चे को सुरक्षित रखा जा सकता है। भ्रूण को सुरिक्षत रखने से पहले यह जांच कर लिया जाता है कि भ्रूण में कैंसर का कोई अंश तो नहीं पहुंच गया। यदि भ्रूण में कैंसर का अंश पहुंच जाता है तो दूसरा भ्रूण सुरक्षित करने के लिए लिया जाता है। ऐसा करने से जेनेटिक कैंसर का असर बच्चे तक नहीं पहुंच पाता।
तीन फीसदी महिला ही होती है तैयार
डॉ. नीना मल्होत्रा ने कहा कि इस विधि से उपचार करवाने के लिए केवल तीन फीसदी महिला ही तैयार होती हैं। उन्होंने कहा कि अक्सर मरीज कैंसर की दवाइयों व अन्य जांच का खर्चा वहन नहीं कर पाता, ऐसे में भ्रूण की जांच व भ्रूण सुरक्षित रखवाने का खर्चा वहन करने के लिए तैयार नहीं हो पाता। इस कारण ज्यादातर महिलाएं सुविधा होने के बाद भी इससे दूरी बनाती हैं।
पांच हजार में हो जाती है जांच
डॉ. नीना मल्होत्रा ने बताया कि एम्स में भ्रूण में कैंसर की जांच केवल 2.5 से 5 हजार रुपए में हो जाती है, जबकि बाहर लैब में यह जांच ज्यादा महंगी है। डॉ. नीना ने कहा कि इस विधि से परिवारिक कैंसर की स्थिति को खत्म किया जा सकता है।