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हरियाणा रणः कई बार छूटी सत्ता, हर बार बढ़ा राजनीतिक कद

Fri, 12 Sep 2014 07:57 PM IST
Updated Fri, 12 Sep 2014 07:57 PM IST
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Each time congress disowned in haryana, it gained more political goodwill.

हरियाणा बनने के बाद से कांग्रेस पार्टी ने प्रदेश में काफी उतार चढ़ाव देखे हैं। इमरजेंसी के दौर में लगभग सफाए तक पहुंची तो बोफोर्स और मंडल कमंडल की मार से हाशिए पर आई। क्षेत्रीय दलों के सिर उठाने का खामियाजा भी इस पार्टी को भुगतना पड़ा।

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बावजूद इसके पार्टी ने अपने जनाधार को मजबूती से थामे रखा। शायद यही वजह है कि गुजरे 48 वर्षों में सरकार जिस भी पार्टी की रही कांग्रेस की भूमिका प्रदेश की राजनीति में हमेशा बनी रही। पेश है हरियाणा में कांग्रेस पार्टी के राजनैतिक सफर और उतार चढ़ाव का इतिहास।
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1966 में 81 विधानसभा क्षेत्र और विधायकों को लेकर अलग राज्य बने हरियाणा की सत्ता कांग्रेस ने ही संभाली थी। सत्ता की चाह और उठापटक की वजह से सिर्फ चार माह में ही पहले सीएम भगवत दयाल शर्मा को कुर्सी छोड़नी पड़ी। हालांकि विशाल हरियाणा पार्टी (वीएचपी) के राव विरेंद्र सिंह भी नौ माह से अधिक सरकार नहीं चला सके।
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पंजाब से टूटकर बने हरियाणा की राजनीति यह दौर तोड़ फोड़ वाला रहा। वीएचपी छोड़ कर कांग्रेस में शामिल हुए उस समय के बड़े लीडर खुर्शीद, गयालाल, हीरालाल की वजह से 1968 के चुनाव में 48 विधायकों के साथ एक बार फिर कांग्रेस सत्ता में आई।

ह‌रियाणा में कांग्रेस ने देखें हैं अच्छे-बुरे द‌िन

Each time congress disowned in haryana, it gained more political goodwill.

1972 में कांग्रेस ने ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया। यह वही दौर था जब प्रदेश में तीसरे विधान सभा चुनाव हो रहे थे। विकास कार्य और गरीबी हटाओ के नारे के दम पर 52 विधायकों के साथ कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।

इंदिरा सरकार द्वारा इमरजेंसी की घोषणा के विरोध में उठे जनता पार्टी के आंदोलन का खामियाजा 1977 के चुनाव में पार्टी को भुगतना पड़ा। कांग्रेस बनाम सभी पार्टियों की इस लड़ाई में पार्टी सिर्फ तीन सीटों में सिमट कर रह गई।

प्रदेश के राजनैतिक इतिहास में कांग्रेस का यह सबसे खराब दौर था। बावजूद इसके प्रदेश में पार्टी का कद कम नहीं हुआ। यही वजह थी कि सत्तारूढ़ जनता पार्टी से 37 विधायकों को लेकर भजन लाल ने 1979 में कांग्रेस का दामन थामा और दो साल बाद सत्ता फिर कांग्रेस के हाथ आ गई।

यह सत्ता 1987 तक इसी पार्टी के हाथ रही। देवीलाल, वीपी सिंह, ओम प्रकाश चौटाला और अन्य दलों के गठबंधन ने कांग्र्रेस के खिलाफ 1987 का चुनाव लड़ा। बोफोर्स और मंडल-कमंडल जैसे मुद्दों के बल पर जनता दल ने सत्ता हथिया ली और कांग्रेस सिर्फ 5 सीटों पर ही सिमटी रह गई।

गठबंधन के नेताओं की राजनैतिक महत्वाकांक्षा और चार साल में चार सीएम बदलने से रुके विकास ने जनता का रुख एक बार फिर कांग्रेस की ओर किया। 1991 में जनता ने कांग्रेस को 51 विधायकों का तोहफा दिया।

कांग्रेस के मुख्यमंत्री रह चुके बंसीलाल ने पार्टी में तोड़ फोड़ कर हरियाणा विकास पार्टी बनाई और 1996 में भाजपा के साथ गठबंधन कर कांग्रेस से सत्ता छीन ली। 2000 के चुनाव में भी कांग्रेस सत्ता से बाहर रही। इस दौरान ओम प्रकाश चौटाला ने राज किया। 2005 से दो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने ही प्रदेश में प्रमुख भूमिका निभाई है।

लगभग तीन दशक से पार्टी के जिलाध्यक्ष बीआर ओझा कहते हैं कि इन आंकड़ों को देखते हुए कांग्रेस को निराश नहीं होना चाहिए। लड़ाई लड़ने की जरूरत है। हालांकि भाजपा सांसद एवं केंद्रीय मंत्री कृष्णपाल गुर्जर का दावा है कि इस बार कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो जाएगी।

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