शीला हो या केजरी सबके लिए वोट बैंक बना ई रिक्शा
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राजधानी में महज दो-तीन साल में ई-रिक्शा की संख्या एक लाख तक पहुंच गई है। परिवहन विभाग, ट्रैफिक पुलिस, परिवहन विशेषज्ञ इसे ट्रैफिक व्यवस्था की बड़ी बीमारी मानते रहे हैं, लेकिन बीमारी क्या है और जड़ से खत्म कैसे होगी इस पर काम नहीं हुआ।
कुछ काम हुआ भी तो समाधान नहीं निकला। धरपकड़ हुई फिर कमेटी बनी, कोर्ट ने आपत्ति जताई, चालकों ने रैली भी की, लेकिन समाधान फिर नहीं निकला।
विशेषज्ञ बताते है कि दिल्ली में ब्लू लाइन बस व ग्रामीण सेवा के बाद ट्रैफिक को दर्द देने वाला सबसे बड़ा कारक ई-रिक्शा है।
शीला हो या केजरी, सबने दिया संरक्षण
दिल्ली के पूर्व परिवहन मंत्री रमाकांत गोस्वामी ने एक बार निर्माता कंपनियों की बिक्री पर रोक लगाने के अलावा एनफोर्समेंट के आदेश भी दिए थे, लेकिन दबाव में सब कुछ रोक दिया गया। ई-रिक्शा विक्रेताओं की राजनीतिक पहुंच है तो चालक राजनीतिक दलों के वोट बैंक बन गए हैं।
यही वजह है कि शुरुआत में शीला दीक्षित तो फिर अरविंद केजरीवाल ने इन्हें संरक्षण दिया। अब भाजपा के केंद्रीय मंत्री ने बिना कानूनी पहलुओं को समझे-परखे इसे नॉन मोटराइज्ड वाहन में शामिल करने की मीठी गोली देकर बीमारी टालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बीमारी बढ़ती जा रही है।
स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में ट्रांसपोर्ट प्लानिंग डिपार्टमेंट के हेड डॉ. पीके सरकार कहते हैं कि बैटरी रिक्शा बहुत खतरनाक हैं। भारी वाहनों के बीच में कहीं भी दौड़ पड़ते हैं। ई-रिक्शा की स्पीड ज्यादा है और टक्कर लगते ही पलट जाते हैं। बाहरी सड़कों पर इन्हें नहीं आना चाहिए।
ई-रिक्शा के खिलाफ एकमात्र हथियार है ये
दिल्ली ट्रैफिक पुलिस ई-रिक्शा को लेकर बेबस और लाचार है। अधिकारियों के अनुसार ई-रिक्शा ट्रैफिक के लिए सिरदर्द है। इसके लिए कानून बनाना जरूरी है। दिल्ली पुलिस के संयुक्त पुलिस आयुक्त (ट्रैफिक) अनिल शुक्ला ने बताया कि ई-रिक्शा एमवी एक्ट के तहत नहीं आते।
ऐसे में इनका चालान नहीं किया जा सकता। अगर यह ट्रैफिक के विपरीत चलता है तो चालक के खिलाफ आईपीसी की धारा 279 के तहत मामला दर्ज होता है। ट्रैफिक पुलिस मामला तभी दर्ज करती है जब चालक खतरनाक ढंग से ई-रिक्शा चलाता है या फिर रिक्शे की वजह से लोगों की जान को खतरा पैदा हो गया हो।
आईपीसी की धारा 279 के तहत मामला दर्ज होेने पर पुलिस रिक्शा चालक को गिरफ्तार करती है और रिक्शा को जमा कर लेती है। पुलिस चालक को थाने से जमानत दे देती है। रिक्शा को कोर्ट के माध्यम से छुड़वाना पड़ता है।
ई-रिक्शा रजिस्ट्रेशन: एनडीएमसी ने नहीं की कोई पहल
ई-रिक्शा को अधिकृत वाहन का दर्जा देने के लिए तीनों नगर निगम अभी कोई नीति नहीं आया है। केवल दक्षिणी निगम ने प्रारूप तैयार करने की कवायद शुरू की है।
पूर्वी और उत्तरी निगम ने अभी कोई पहल नहीं की है जबकि केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की घोषणा के बाद तीनों निगम की स्थायी समिति ने ई-रिक्शा का रजिस्ट्रेशन करने के लिए अपने-अपने आयुक्त को आदेश देते हुए प्रस्ताव पास किया था। एनडीएमसी ने तो ई-रिक्शा के रजिस्ट्रेशन के लिए नीति बनाने का फैसला भी नहीं किया है।
दक्षिणी निगम के सदन के नेता सुभाष आर्य ने बताया कि विभाग ने ई-रिक्शा के रजिस्ट्रेशन की नीति मोटे तौर पर तैयार की है। इसके प्रारूप के अनुसार, ई-रिक्शा की फीस 300 रुपये रखी जाएगी। रजिस्ट्रेशन उसी के नाम पर किया जाएगा जो व्यक्ति उसे चलाएगा।
मोटर चालित वाहनों की भांति ई-रिक्शा को 4 अंकों वाला नंबर भी दिया जाएगा। अंग्रेजी शब्दों में सबसे पहले निगम के नाम वाला होगा, जबकि दूसरा नंबर जोन के नाम का होगा।
देखते-देखते लाइफलाइन बन गए
बॉर्डर इलाकों में रोजाना पैदल सफर करने वालों को इससे काफी सहूलियत मिली है। यहां रिक्शा चालकों के मनमाने किराये की मांग और ऑटो चालकों की ना-नुकर की ई-रिक्शा ने छुट्टी कर दी है
आनंद विहार रेलवे स्टेशन और बस अड्डे से कौशांबी जाने के लिए रिक्शा चालक सौ रुपये की मांग करता है, तो ऑटो चालक बॉर्डर पार करने से मना कर देता है। लेकिन दस-बीस रुपये के किराये पर ई-रिक्शा आसानी से मुसाफिरों को मंजिल तक पहुंचा देता है।
बॉर्डर पर पीक आवर्स में ई-रिक्शा की संख्या ज्यादा होती है। इस दौरान बीच सड़क पर आड़ा-तिरछा खड़ा कर चालक सवारियों का इंतजार करते हैं। बगैर छह से आठ सवारियां बैठाए टस से मस नहीं होते।
ई-रिक्शा की संख्या बढ़ने से सबसे ज्यादा परेशानी ऑटो चालकों को हो रही है। सस्ता होने के कारण सवारियां अब ई-रिक्शा को प्राथमिकता देती है। मेट्रो स्टेशन के बाहर हो या कॉलोनी का कोई स्टैंड, यात्री पांच से सात किलोमीटर तक का सफर ई-रिक्शा से करते हैं। इसमें ऑटो से ज्यादा लोग भी बैठ जाते हैं, इसके चलते ऑटो को जल्दी यात्री नहीं मिलते।
बैट्री चार्ज करने के स्टेशन खुले
ई-रिक्शा की संख्या बढ़ने के साथ ही बैट्री को चार्ज करने का धंधा भी शुरू हो गया है। कई इलाकों में बैट्री चार्ज करने के लिए चार्जिंग स्टेशन खुल गए हैं। यहां घरेलू बिजली से बैट्री चार्ज करते हैं, जबकि प्रयोग कमर्शियल होता है।
पुरानी दिल्ली, यमुनापार समेत कई इलाकों में इस तरह के चार्जिंग स्टेशन चल रहे हैं। इसकी जरूरत इसलिए भी है क्योंकि अब चालक एक साथ कई बैट्री रखते हैं। ई-रिक्शा के पार्ट्स चाइना से आते हैं और भारत में असेंबल किया जाता है। डिजाइन और ग्रेविटी को लेकर कोई मानक नहीं है।
यही वजह है कि सभी कंपनियां अपने-अपने मुताबिक इसे तय करती है। भारत में सिर्फ हरियाणा में एक कंपनी है, जिसने ई-रिक्शा भारत में बनाने की शुरुआत की है। अभी भी चाइना से आए पार्ट्स से बने ई-रिक्शा सड़कों पर सबसे ज्यादा हैं।
सुविधा तो मिली पर परेशानी भी कम नहीं
दिल्ली में ई-रिक्शा से लोगों को सहूलियत के साथ परेशानी भी हो रही है। दो राज्यों के बीच आवाजाही की पाबंदी से ऑटो चालक बॉर्डर पार नहीं करते, जबकि ई-रिक्शा आसानी से दिल्ली-यूपी और दिल्ली-हरियाणा का सफर कराता है।
दूसरी तरफ ट्रैफिक नियमों की अनदेखी करते चालक ट्रैफिक जाम की बड़ी वजह भी बनते हैं। भोपुरा, अप्सरा, आनंद विहार, बदरपुर, गुड़गांव, बहादुरगढ़ बॉर्डर पर पीक आवर्स में ई-रिक्शा की संख्या ज्यादा होती है। इस दौरान बीच सड़क पर आड़ा-तिरछा खड़ा कर चालक सवारियों का इंतजार करते हैं।
इन पर न तो ट्रैफिक पुलिस का खौफ रहता है, न ही सवारियों की परेशानी समझ में आती है। बगैर छह से आठ सवारियां बैठाए टस से मस नहीं होते। खास बात यह कि ऑटो चालकों और अन्य वाहनों के चालकों से बहस भी चलती रहती है। इसका असर दूसरे वाहनों की आवाजाही पर पड़ता है।
‘ई-रिक्शा आम लोगों के लिए खतरनाक’
राजधानी की सड़कों पर चल रहे ई-रिक्शा के चालकों के पास न तो लाइसेंस है न ही उनका बीमा। चालकों का वेरिफिकेशन भी नहीं है, ऐसे में वे आम लोगों के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं।
यातायात पुलिस के उप-आयुक्त आरके झा ने बुधवार को हाईकोर्ट के समक्ष शपथपत्र दायर कर बताया कि इस वर्ष छह माह में लापरवाही और तेज गति से वाहन चलाने वाले 137 ई-रिक्शा चालकों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।
ई-रिक्शा से दुर्घटनाओं में दो लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 29 लोग घायल हुए हैं। पुलिस ने कहा कि ई-रिक्शा का बीमा नहीं होने से पीड़ित पक्ष को मिलने वाले मुआवजे की भी समस्या सामने आ रही है। यह पैदल चलने वालों के लिए ज्यादा खतरनाक है।
250 वाट से शुरू होकर 650 वाट तक जा पहुंचा
पर्यावरण को राहत देने के लिए बैट्री चालित ई-रिक्शा सड़क पर उतारा गया। पर्यावरण को तो इससे राहत नहीं मिली, लेकिन यह राजनीतिक फायदा उठाने का जरिया जरूर बन गया। नतीजा राजनीतिक पहिये पर घूमता-घूमता 250 वाट की क्षमता से शुुरू हुआ ई-रिक्शा अब 650 वाट तक पहुंच गया है।
द इंडियन फाउंडेशन ऑफ ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड ट्रेनिंग के सीनियर फेलो एसपी सिंह के मुताबिक, पर्यावरण के लिए ई-रिक्शा अच्छा कदम था, लेकिन बगैर नीति के आगे बढ़ने से यह मुसीबत बन गया है। इसे सड़कों और इस पर सफर करने वालों पर लाद दिया गया है।
बिना तैयारी का ही नतीजा है कि यह सफर करने वाले यात्रियों और यातायात दोनों के लिए मुफीद नहीं है। ई-रिक्शा को लेकर जो घोषणाएं पिछले दिनों की गईं उसे लागू करना एक लंबी प्रक्रिया है।
ई-रिक्शा में कब क्या हुआ
- . दिल्ली की सड़कों पर इलेक्ट्रिक रिक्शा 2011 में दिखाई देने शुरू हुए।
- .नवंबर, 2012 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने परिवहन विभाग को पॉलिसी बनाने के निर्देश दिए।
- .जनवरी, 2013 में परिवहन विभाग ने क्षमता से अधिक वाट क्षमता वाले ई-रिक्शा को जब्त करना शुरू किया।
- .मार्च, 2013 में कोर्ट ने परिवहन विभाग ने पूछा कि इलेक्ट्रिक व्हीकल मोटर व्हीकल है या फिर नॉन मोटराइज्ड व्हीकल, अगर मोटराइज्ड है तो रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं करते, नॉन मोटराइज्ड है तो फिर कार्रवाई क्यों?
- .अप्रैल, 2013 मुख्यमंत्री ने बैठक लेकर फिर से इलेक्ट्रिक रिक्शा की बिक्री रोकने के आदेश को बदला और एक नई कमेटी बनाई। कार्रवाई भी रोकने के निर्देश दिए।
- .कमेटी ने टेरी के साथ मिलकर ई रिक्शा की जांच की जिसमें पाया कि वाट क्षमता अधिक थी और स्पीड भी 25 किमी प्रति घंटा से अधिक थी।
- .केन्द्र सरकार ने शीला दीक्षित के कार्यकाल में भी एक राष्ट्रीय ड्राफ्ट पॉलिसी प्रकाशित की, लेकिन उस पर शीला ने आपत्ति दर्ज कराई। मामला रुक गया।
- .19 मार्च, 2014 को दिल्ली सरकार ने जनसूचना निकाली जिसमें निर्माण कंपनी को टाइप अप्रूवल लाने और 250 वाट से कम होने का सर्टिफिकेशन लाने को कहा। तीन महीने में विक्रेताओं को रजिस्टर होने और 6 महीने में गाड़ी रजिस्ट्रेशन कराने का टाइम दिया था।
- . 25 अप्रैल, 2014 को केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी करके रोक लगाई।
- . 17 जून 2014 को नितिन गडकरी ने रामलीला मैदान में रैली करके 650 वाट तक के ई-रिक्शा को नॉन मोटराइज्ड मानने को कहा।