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एक साल की बच्ची का लिवर ट्रांसप्लांट, रक्त संचार के लिये लगाई गाय की नस
Wed, 08 Jan 2020 10:41 PM IST
अवधेश कुमार
अमर उजाला ब्यूरो, गुरुग्राम
अमर उजाला ब्यूरो, गुरुग्राम
Published by: अवधेश कुमार
Updated Wed, 08 Jan 2020 10:41 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
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बिलियरी एट्रेसिया नामक दुर्लभ बीमारी से पीड़ित एक साल की बच्ची का आर्टेमिस अस्पताल में लिवर प्रत्यारोपण किया गया। सऊदी अरब निवासी बच्ची को उसकी मां ने ही लिवर का हिस्सा दिया था।
खास बात यह है कि इस सर्जरी के लिये विश्व में पहली बार गाय की नस का भी प्रयोग किया गया। सऊदी अरब निवासी बच्ची की मोनो सेगमेंट (सेगमेंट-3) लिवर ग्राफ्ट ट्रांसप्लांट नामक सर्जरी करने में 14 घंटे का समय लगा। बच्ची की सफल सर्जरी के बाद उसके माता पिता बेहद खुश हैं।
अस्पताल के चिकित्सकों ने बताया कि फातिमा नामक बच्ची के लिवर के आठ में से केवल एक भाग को प्रत्यारोपित किया गया है। इस सर्जरी के लिये गाय की नस का प्रयोग किया क्योंकि नये लिवर को रक्त पहुंचाने वाली पोर्टल नस बच्ची में विकसित नहीं हुई थीं। इस लिहाज से डॉक्टरों ने एक अनोखा प्रयोग किया।
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खास बात यह है कि इस सर्जरी के लिये विश्व में पहली बार गाय की नस का भी प्रयोग किया गया। सऊदी अरब निवासी बच्ची की मोनो सेगमेंट (सेगमेंट-3) लिवर ग्राफ्ट ट्रांसप्लांट नामक सर्जरी करने में 14 घंटे का समय लगा। बच्ची की सफल सर्जरी के बाद उसके माता पिता बेहद खुश हैं।
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अस्पताल के चिकित्सकों ने बताया कि फातिमा नामक बच्ची के लिवर के आठ में से केवल एक भाग को प्रत्यारोपित किया गया है। इस सर्जरी के लिये गाय की नस का प्रयोग किया क्योंकि नये लिवर को रक्त पहुंचाने वाली पोर्टल नस बच्ची में विकसित नहीं हुई थीं। इस लिहाज से डॉक्टरों ने एक अनोखा प्रयोग किया।
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दुर्लभ बीमारी से पीड़ित थी बच्ची
डॉक्टरों ने बताया कि सऊदी अरब निवासी साराह और अहमद की तीसरी संतान फातिमा जन्म से ही बिलियरी एट्रेसिया नामक दुर्लभ बीमारी से ग्रसित थी। यह बीमारी 16 हजार में से एक नवजात शिशु में पाई जाती है। ऐसे बच्चों में बाइल डक्ट्स का विकास नहीं हो पाता। बच्ची का वजन महज 5.2 किलो था।
इस वजह से ऑपरेशन काफी जटिल था। इस सर्जरी के लिये फातिमा को भारत लाया गया और आर्टेमिस अस्पताल में उसका इलाज किया गया। खास बात यह है कि बिलियरी बाईपास सर्जरी की असफलता के कारण सऊदी अरब के डॉक्टरों ने फातिमा के लिवर ट्रांसप्लांट की सलाह दी थी।
इस वजह से ऑपरेशन काफी जटिल था। इस सर्जरी के लिये फातिमा को भारत लाया गया और आर्टेमिस अस्पताल में उसका इलाज किया गया। खास बात यह है कि बिलियरी बाईपास सर्जरी की असफलता के कारण सऊदी अरब के डॉक्टरों ने फातिमा के लिवर ट्रांसप्लांट की सलाह दी थी।
जटिल था आपरेशन
इस ट्रांसप्लांट के शल्य चिकित्सक डॉ. गिरिराज बोरा ने बताया कि 6 किलो से कम वजन के बच्चों में ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया बेहद जटिल होती है। इस सर्जरी में तो मां द्वारा दिया गया लिवर का हिस्सा भी बच्ची के लिवर की तुलना में काफी बड़ा था। बच्ची की मां अकेली डोनर थी जो उपलब्ध हो पायी थी। अब यह बच्ची और उसकी मां स्वस्थ हैं।