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FIR और बयान में फर्क, दोनों हाथ जले थे तो कैसे लिख दी तहरीर

Wed, 21 Oct 2015 05:35 PM IST
Updated Wed, 21 Oct 2015 05:35 PM IST
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difference in the statement and FIR

जितेंद्र ने बयान दिया है कि हमलावरों ने बाहर से पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी। पीड़ित भाग न सकें इसलिए आरोपियों ने बाहर से दरवाजा बंद कर दिया था।

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उसने एक मोखले से अपने बच्चों और पत्नी को दूसरे कमरे में पहुंचाया और खुद भी उसी से निकला। जबकि उसने जो एफआईआर दर्ज कराई है उसके मुताबिक पेट्रोल के छींटे पड़ने पर वह कमरे का दरवाजा खोल कर बाहर निकला और चार लोग अंदर घुस गए।

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इसके बाद दो युवकों ने माचिस की तीली जलाकर आग लगाई और फरार हो गए। गांव वालों की मानें तो जितेंद्र के कमरे में बाहर से ताला लगा हुआ था और चारों अंदर आग से घिरे हुए कमरे में कैद थे।
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क्यों नहीं तोड़ा जलता हुआ दरवाजा ?

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ग्रामीणों ने दरवाजे का ताला तोड़कर दरवाजा खोला और सबको बाहर निकाला गया। मालूम हो कि दरवाजे में भी नीचे की ओर आग लगाई गई थी। सवाल यह उठता है कि ग्रामीणों ने जलता हुआ दरवाजा तोड़ने की बजाय उसका ताला तोड़ने का क्यों प्रयास किया?


जलता हुआ दरवाजा तोड़ना ज्यादा आसान और कम जोखिम वाला होता अपेक्षाकृत जलते हुए दरवाजे का ताला तोड़ने के। एफआईआर में पुलिस ने लिखा है कि जितेंद्र ने उसे लिखित तहरीर दी।

सवाल यह उठता है कि जब जितेंद्र के दोनों हाथ झुलसे हुए थे तो उसने तहरीर कैसे लिख दी? कहीं पुलिस मामले को रफा दफा करने के लिए अपने ढंग से तो तहरीर नहीं दर्ज कर रही है।

पुलिस ने नहीं की थी छेड़छाड़ की रिपोर्ट दर्ज

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दलित परिवार के लोगों का कहना है कि छह दिन पहले सवर्ण जाति के लोगों ने दलित रेखा के साथ छेड़छाड़ की घटना को अंजाम दिया था। वह शिकायत लेकर सदर थाने गई थी, लेकिन पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने से मना कर दिया।

बीएसपी नेता खजूरका निवासी रोहतास, बसपा के जिलाध्यक्ष रतिराम व कांग्रेस एससी-एसटी सेल की पूनम का कहना है कि वह पीड़ित परिवार को लेकर पुलिस आयुक्त सुभाष यादव से मिलने गई थीं, लेकिन उन्होंने धमका कर भगा दिया।

उनका यह भी आरोप है कि उक्त पुलिस कमिश्नर के चलते ही पिछले दिनों अटाली कांड हुआ और अब दलित परिवारों पर अत्याचार हो रहा है। अगर पुलिस घटना को गंभीरता से लेती तो आज जितेंद्र के दोनों बच्चे जिंदा होते।

दलितों को सरकार नहीं देती संरक्षण

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समुदाय के लोगों का कहना है कि सरकार दलितों को न तो हिन्दू समझती है और न ही मुसलमान। पूरे प्रदेश में दलितों पर अत्याचार हो रहे हैं, सरकार कुछ करने को तैयार नहीं है।

उनका यह भी कहना है कि वर्ष 2014 में हुई घटना के बाद से ही गांव के कई दलित परिवार गांव छोड़कर बाहर रहने लगे हैं, फिर भी पुलिस प्रशासन उनकी सुरक्षा नहीं कर पा रहा है।

देरशाम चंड़ीगढ़ से सुनपेड़ गांव पहुंचे क्षेत्रीय विधायक टेकचंद शर्मा ने घटना को दुखद बताया और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई कराने की बात कही। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री से बात कर यथा संभव मदद की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि किसी निर्दोष के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। पुलिस जांच पूरी निष्पक्षता के साथ करेगी।

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