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अधिग्रहण के बावजूद 50 बार बिक गई एक ही जमीन, बनते रहे अवैध निर्माण
सुशील पांडेय, नोएडा, अमर उजाला
Updated Mon, 06 Aug 2018 12:11 AM IST
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Dumping Ground
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प्राधिकरण की लापरवाही ऐसी कि जमीन का अधिग्रहण तो कर लिया, लेकिन खतौनी में अपना नाम नहीं चढ़वाया। लिहाजा, जमीन का मालिकाना हक लोगों के ही नाम रह गया। नतीजा यह हुआ कि जमीनें बिकती रहीं और प्राधिकरण सोता रहा। आलम यह है कि एक ही जमीन 50 बार से ज्यादा बिक गई। शहर में प्राधिकरण की कई अधिगृहीत जमीनों पर अतिक्रमण की यही वजह है।
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नोएडा प्राधिकरण ने हाल ही में एक सर्वे रिपोर्ट जारी की है। इसमें प्राधिकरण की अधिसूचित जमीन पर 114 निर्माण की बात सामने आई हैं। यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऐसे निर्माण कब और कैसे हो गए, जबकि अधिग्रहण के बाद ऐसी जमीन को सरकारी जमीन माना जाता है। सूत्रों के मुताबिक, प्राधिकरण ने कई गांवों की जमीन का अधिग्रहण 2006 में किया था। इससे पहले गांवों को 1976 और 1989 और 1997 में अधिसूचित किया गया। अधिसूचित करने के बाद अधिग्रहण की कार्रवाई की गई।
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2006 में अधिग्रहण करने के बाद खतौनी में नोएडा प्राधिकरण का नाम आ जाना चाहिए था, लेकिन प्राधिकरण जमीन अधिग्रहण के बाद सो गया। यह नींद 2014 में जाकर खुली। इस बीच जहां-जहां अधिग्रहण किया गया था। वहां-वहां उस जमीन की बिक्री होती रही, चूंकि जमीन को खरीदने के लिए पार्टी खतौनी में नाम देखती है और रजिस्ट्री की बात सोचती है। खतौनी में गांव के निवासी का नाम दर्ज होने से यह जमीन बिकती रही। लोगों ने किसी तरह की आपत्ति भी नहीं की। इस तरह से वहां ऊंची-ऊंची इमारतें खड़ी होती रहीं, जो अब नासूर की तरह हो गई है।
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मुआवजे का पेच मानकर बचता रहा प्राधिकरण
अधिगृहीत जमीन पर बनी इमारतों को प्राधिकरण यह कहकर छोड़ता चला गया कि इस जमीन का मुआवजा नहीं उठाने का तर्क किसान दे रहे हैं। लिहाजा, संभव है कि आबादी का विनियमितीकरण किया जाए और यह जमीनें वापस कर दी जाएं।
3000 हेक्टेयर जमीन कैसे हो गई गायब
नोएडा की स्थापना के बाद प्राधिकरण ने यहां 15280 हेक्टेयर जमीन को शहरीकरण के लिए माना और अधिग्रहण शुरू किया, लेकिन वर्तमान समय तक 12325 हेक्टेयर जमीन का ही अधिग्रहण हो पाया। करीब 3000 हेक्टेयर जमीन बच गई थी। अब हालात यह हैं कि यह जमीन अधिग्रहण के लायक ही नहीं बची। वजह यह कि यहां आबादी बढ़ गई। इस वजह से शहरीकरण के लिए निर्धारित जमीन गायब हो गई।
गढ़ी चौखंडी में सबसे ज्यादा मामले
अधिग्रहण के बाद आठ साल तक जमीन अपने नाम नहीं कराने का सबसे ज्यादा मामला गढ़ी चौखंडी का है। इसके अलावा दूसरे कई अन्य गांव भी हैं। जहां इस तरह के मामले हैं। यहां आठ साल तक जमकर लापरवाही की गई और इमारतें बनती रहीं। जब प्राधिकरण ने खतौनी में नाम चढ़वाया। तब तक मामला हाथ से निकल चुका था। अब यहां प्राधिकरण और जमीन का वर्तमान मालिक एक दूसरे से लड़ रहे हैं।