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नोटबंदी ने 100 साल के बुजुर्ग के सिर से छीनी छत, तो नाविक को पड़े खाने के लाले

Thu, 24 Nov 2016 05:23 PM IST
संजीव श्रीवास्तव/अमर उजाला, नोएडा
संजीव श्रीवास्तव/अमर उजाला, नोएडा Updated Thu, 24 Nov 2016 05:23 PM IST
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demonetisation took away the roof of a 100 year old man
खुले आसमां के नीचे रहने को मजबूर अब्दुल - फोटो : लाल स‌िंह/अमर उजाला

गजरौला की मेन मार्केट से अगर आप गुजरें तो दुकानों के बीच एक बिना छत के मकान में 100 साल के बुजुर्ग अब्दुल रहमान चारपाई पर बैठे दिखाई पड़ जाएंगे। उनके चेहरे पर निराशा ने कब्जा कर लिया है फिर भी वो हर आने-जाने वाले को इस उम्मीद से निहारते हैं कि शायद कोई उनकी मदद कर दे।

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अब्दुल ने पिछले महीने ही जर्जर हो चुके अपने मकान को गिरवा दिया ताकि ठंड आने से पहले वो पक्की छत ठलवा सकें। चारों तरफ की दिवारें खड़ी हो चुकी थी। छत की ढलाई होने की तैयारी चल ही रही थी कि आठ नवंबर की रात प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषण कर दी।
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आनन-फानन में अब्दुल ने भी अपनी जीवन भर की जमापूंजी बैंक में जमा करवा दी ताकि इस उम्र में उन्हें पुराने नोट इस्तेमाल करने और कानून तोड़ने की जलालत न झेलनी पड़े। 
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नोट जमा करने के बाद से उन्हें अभी तक चंद हजार रुपये ही मिल सके हैं जो निकलते ही खर्च हो गए। मजदूरों ने बिना पैसे के काम करने से इनकार कर दिया है और हार्डवयेर की दुकान से उधार सामान मिलना भी बंद हो गया है। पिछले एक हफ्ते से अब्दुल के घर का निर्माण कार्य रुका हुआ है और सर्दी की आहट के बीच वो बिना छत वाले मकान में रहने को मजबूर हैं।

भ‌िखारी को नहीं दे रहा कोई भीख

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भ‌िखारी की हालत भी खराब - फोटो : लाल स‌िंह/अमर उजाला

ये कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असल में गजरौला में मूंग की दाल खाने का खासा प्रचलन है। मसालों के साथ पकाई गई मूंग की दाल की दुकान को कटोरों में पीना यहां लोगों को काफी पसंद है। बाजारों में आपको दालवालों की दुकान दिख ही जाएगी।

ऐसी ही एक दुकान के सामने भीख मांग रहा अयूब पिछले तीन दिन से बिना कुछ खाए सड़क पर ही पड़ा हुआ है। 23 साल के अयूब का बायां हाथ और पैर ख्रराब है इसलिए लोगों से मिलने वाली भीख से उसके रोज के खाने-पीने का इंतजाम होता है।

अयूब कहता है कि नोटबंदी के बाद से बाजारों में ऐसी वीरानी पसरी है कि लोगों का आना-जान आधे से भी कम हो गया है वहीं, अब अगर वो कुछ मांगता है तो दुकानदार भी उस पर बिफर पड़ते हैं। कहते हैं हमारी बोहनी हो नहीं रही और तू मुंह उठाए चला आता है भीख मांगने।

भीख में मिलने वाले सिक्के को गिनते हुए वो बताता है कि पिछले तीन दिन में उसकी इतनी ही कमाई हुई है जिससे एक वक्त का खाना मिलना भी मुश्किल है।

बच्चों को ब्रेड तक नहीं ख‌िला पा रहा असहाय नाव‌िक

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रोता नाव‌िक और खाली पड़ी घाट की दुकानें - फोटो : लाल स‌िंह/अमर उजाला

गजरौला के मेन मार्केट से निकल कर जैसे ही आप हाईवे पर आते हैं तो ये रास्‍ता आपको गढ़मुक्तेश्वर नाम के मशहूर धार्मिक स्‍थल की ओर ले जाता है। यहां के ब्रजघाट की धार्मिक मान्यता होने के साथ ही यह सैलानियों के आकर्षण का भी बड़ा केंद्र है।

हमेशा गुलजार रहने वाला ब्रजघाट भी नोटबंदी की चपेट में है। यहां नाव चलाने से लेकर पूजा सामग्री बेचने का काम करने वालों के घर का खर्च रोज की कमाई से ही चलता है। जो कुछ जोड़ कर रखा था वो पिछले दस दिन में खत्म हो चुका है और अब कमाई का भी बुरा हाल है।

ब्रजघाट पर नाव चला कर अपना गुजारा करने वाले महेश बताते हैं कि पिछले तीन दिन से वो अपनी नाव केवल तीन बार ही खूंटे से खोल पाए हैं। ऐसा नहीं है कि लोग नहीं आ रहे हैं, लेकिन पिछले एक हफ्ते से नाव की सवारी करने वालों की संख्या एक तिहाई हो गई है। महेश को पिछले तीन दिन से केवल तीन ग्राहक मिले हैं और कमाई की हालत ये है कि पिछले पांच दिन से उनके घर में सब्जी नहीं बन पा रही है।

महेश बताते हैं कि सुबह-सुबह बच्चे स्कूल जाते समय ब्रेड मांगते हैं, लेकिन उन्हें ब्रेड तक खरीद कर नहीं दे पा रहे हैं...इतना कहते-कहते वो रो पड़ते हैं।

ऐसी ही मजबूरी का सामना कर रहे किशोरी लाल बताते हैं कि लोगों के पास पैसे तो हैं लेकिन वो खर्च करने से डर रहे हैं। उन्हें डर है कि अगर छुट्टे पैसे खतम हो गए तो फिर दोबारा बैंक और एटीएम की लंबी लाइन में लगना पड़ेगा। इसकी कोई गारंटी भी नहीं है कि लाइन में लगने के बाद पैसे मिल ही जाएं। किशोरी लाल पिछले तीस सालों से ब्रजघाट पर पूजा का सामान बेचने की छोटी सी दुकान चला रहे हैं।

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