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नोटबंदी का असरः ‘बिन दिहाड़ी अब फाका, मजदूर लौटने लगे वतन’
शाहनवाज आलम/अमर उजाला, गुरुग्राम
Updated Tue, 29 Nov 2016 09:28 AM IST
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प्रतीकात्मक चित्र
- फोटो : लाल सिंह
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दिल्ली से सटे डूंडाहेड़ा और कापसहेड़ा बॉर्डर जिसे लेबर चौक भी कहा जाता है। पहले कभी यहां मजदूरों की भीड़ रहा करती थी। लेकिन नोटबंदी के बाद से ये वीरान पड़ा है। पैसे का जुगाड़ न होने के कारण कंस्ट्रक्शन साइटों पर काम बंद पड़ा है। जिससे ज्यादातर मजदूर यहां तो अपने घर लौट चुके हैं या फिर लौटने की तैयारी में हैं।
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बिहार के सिवान से कई दशक पहले गुरुग्राम आए दीपलाल पेशे से मिस्त्री हैं, लेकिन नोटबंदी के बाद कई दिनों से रोजगार नहीं मिला है। अब वापस सिवान लौटने की तैयारी कर रहे हैं। दीपलाल का कहना है कि उनके जानने वाले दो दर्जन से अधिक लोग अपने-अपने घर लौट गए हैं।
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वहीं, बिहार मधुबनी के रामप्रीत का कहना है कि जीवन में इतनी दिक्कत कभी नहीं हुई। स्कूल में पढ़ने वाली तीन बच्चियां हैं। पत्नी और घर परिवार भी है। 500 रुपये के बंद होने के बाद से अब उधार का ही सहारा है। 15 दिन बीत जाने के बाद उधारी बंद हो गई है। दिहाड़ी काम भी नहीं मिल रहा है। बिन दिहाड़ी अब फाका की नौबत आ गई है।
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मोदी सरकार ने 08 नवंबर की शाम को एक चौंकाने वाली घोषणा में 500 और 1000 रुपए के नोटों पर बैन लगा दिया था। इसके बाद से सरकार ने कुछ प्रावधान जरूर बनाए हैं, जिनके तहत तय मात्रा में पुराने नोटों की बदली हो सकती है और एक निर्धारित रकम बैंकों या एटीएम से निकाली जा सकती है। लेकिन लेबर चौक पर जितने भी मजदूरों से मुलाकात हुई, उनमें से 80 फीसदी के पास न तो बैंक खाता है और न ही एटीएम कार्ड।
चाहे बढ़ई हो या पेंटर या फिर मिस्त्री, सभी की रोजमर्रा की जिंदगी दिहाड़ी से कमाए गए पैसों पर ही चलती है। लगभग सभी मजदूरों ने दूसरे प्रदेशों से गुरुग्राम, नोएडा या दिल्ली का रुख इसलिए किया था, क्योंकि यहां दिहाड़ी का रेट ज्यादा है, लेकिन अब नोटबंदी ने दिहाड़ी के सारे समीकरण बदल दिए।
राजस्थान भरतपुर के बुडवाई गांव के अनारदेई को इस बात का डर सता रहा है कि कहीं वापस न लौटना पड़ जाए। उन्होंने कहा, मेरा मकान मालिक किराए के लिए पीछे पड़ा है। दो हफ्ते से काम मिला नहीं है तो पैसे बचे ही नहीं। खाने-पीने के लाले पड़ गए हैं और कई दफा बिस्कुट के सस्ते पैकेट से काम चलाना पड़ा है। काम देने वालों के पास काम की कमी नहीं है लेकिन नोटबंदी ने उनकी दुकान पर ताले लगा दिए हैं। दिहाड़ी देने के लिए कैश रकम ही नहीं है।
भरतपुर के रविंद्र सिंह की कहानी भी ज्यादा इतर नहीं है। पेशे से पेंटर रविंद्र के मुताबिक अगर सरकार को इतना बड़ा कदम लेना ही था तो फिर गरीबों को थोड़ा समय तो दिया जाता। जिससे राशन-पानी का जुगाड़ कर लेते। अब तो भूखे रहने की नौबत आ चुकी है। बता दें कि लेबर चौक जैस भीड़-भाड़ वाली जगह पर नोटबंदी का असर सिर्फ मजदूरों में ही नहीं, बल्कि दुकानदारों पर भी दिख रहा है। छोले-कुलचे और पूरी-सब्जी की दुकान चलाने वालों ने बताया कि एक सीमा के बाद उन्होंने भी अब उधार देना बंद कर दिया है।
आंकड़े भी दे रहे प्रदेश वापसी की गवाही
दिहाड़ी मजदूरों की प्रदेश वापसी की गवाही रेलवे के टिकट और रोडवेज के बस काउंटर दे रहे हैं। बीते 15 दिनों में टिकट बुकिंग का ग्राफ अचानक 300 फीसदी बढ़ गया है। वहीं, आनंद विहार और दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जाने वाली डीटीसी बसों में अधिक भीड़ हो गई है। गुरुग्राम रेलवे स्टेशन पर नोटबंदी से पहले औसतन 2500 टिकटें बुक होती थी, लेकिन नोटबंदी के बाद यह ग्राफ तेजी से बढ़ा है। 19 से 24 नवंबर के बीच 27849 टिकटें बुक हुई हैं। इसमें अधिकांश बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और ओडिसा के शहरों की टिकटें है। 25, 26 और 27 नवंबर को हर दिन औसतन 16 हजार से अधिक टिकटें बुक हुई है। वहीं, आनंद विहार जाने वाले डीटीसी बसों में जाने वाले लोगों की संख्या अधिक है। डीटीसी बस के ड्राइवर संजीव कुमार कहते हैं भीड़ अधिक हो रही है। ज्यादातर पूरे साजो-सामान के साथ आनंद विहार रेलवे स्टेशन तक जा रहे हैं।