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दिल्ली हिंसा : चार दिन बाद भी परिजनों को नहीं मिले शव, मोर्चरी के बाहर बैठकर कर रहे हैं इंतजार

Sat, 29 Feb 2020 05:16 AM IST
संजीव कुमार झा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: संजीव कुमार झा Updated Sat, 29 Feb 2020 05:16 AM IST
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Delhi violence, Even after four days, the dead bodies could not given to family
दिल्ली हिंसा - फोटो : अमर उजाला
हिंसा के बाद अब अपनों का शव लेने के लिए लोगों को धक्के खाने पड़ रहे हैं। पूर्वी दिल्ली के जीटीबी अस्पताल में बीते चार दिन से परिजन मोर्चरी के बाहर बैठे हुए हैं। इन्हें शव की शिनाख्त करने के बाद इंतजार करने के लिए कहा है। भूख और प्यास से बेचैन इन लोगों को पहले से ही अपनों को खोने का गम है, ऐसे में लचर व्यवस्था इनके जख्मों को और भी ज्यादा कुरेदने जैसा काम कर रही है।
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प्रशासन ने मोर्चरी परिसर में एक तंबू लगा दिया है, जहां अशफाक हुसैन की चाची दो दिन से बैठी हुई हैं। ये बुलंदशहर से यहां आई हैं। अपने भतीजे को हिंसा में खोने के बाद अब वे कभी डॉक्टर तो कभी कर्मचारी से पोस्टमार्टम कर शव कब मिलने के बारे में पूछती रहती हैं?
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इसी तंबू में मौजूद हसन ने बताया कि जब तक दिल्ली पुलिस का आईओ रिपोर्ट नहीं देगा, तब तक मेडिकल बोर्ड भी नहीं बनेगा। बृहस्पतिवार को स्थानीय विधायक राम निवास गोयल की मदद लेकर सचिवालय से मेडिकल बोर्ड गठित करने का अधिकार जीटीबी अस्पताल के निदेशक डॉ. सुनील कुमार को दिला दिया है, लेकिन डॉ. सुनील कुमार का कहना है कि जब तक आईओ की रिपोर्ट उन्हें नहीं मिलेगी तब तक पोस्टमार्टम के लिए प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती है। ये कानून की प्रक्रिया है, इसमें अस्पताल की ओर से कोई देरी नहीं की जा रही है।
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बहरहाल बीते चार दिन में महज 13 पोस्टमार्टम ही अब तक हुए हैं। अभी भी यहां 25 शवों के पोस्टमार्टम का इंतजार है। मृतक शाहिद के भाई ने बताया कि उसके रिश्तेदारों से भाई की मौत के बारे में पता चला। तीन दिन से जीटीबी की मोर्चरी के बाहर वे इंतजार कर रहे थे। शुक्रवार को जब पोस्टमार्टम होने लगा तो चार हजार रुपये की मांग की जा रही है। चार हजार रुपये लेकर वीडियोग्राफी करने के लिए कहा जा रहा है।

राजस्थान के मूल निवासी बीरबान सिंह भी हिंसा में मारे गए। उनके सिर में गोली लगने से मौत हुई है। करावल नगर में रहने वाले बीरबान सिंह दिल्ली में जींस का काम करते थे। उनके भाई मुकेश ने बताया कि तीन दिन से वे शव लेने का इंतजार कर रहे हैं। बार-बार घर से फोन आ रहा है। बीरबान सिंह की पत्नी और बच्ची राजस्थान में इंतजार कर रहे हैं।

पिता का शव अभी तक नहीं मिला

उत्तरी घोंडा निवासी साहिल ने बताया कि बीते मंगलवार को उनके पिता परवेज आलम घर के बाहर दरवाजे पर खड़े थे, तभी उपद्रवियों ने उन्हें घेर लिया। परवेज आलम ने काफी बचाव किया, लेकिन उपद्रवियों ने उन्हें गोली मार दी। साहिल अपने पिता को लेकर अस्पताल पहुंचे, जहां उनके पिता को मृत घोषित कर दिया गया। बुधवार से जीटीबी की मोर्चरी में परवेज आलम का शव रखा हुआ है, लेकिन अभी तक उन्हें नहीं मिला है।

वहीं मृतक दिनेश के भांजे अश्विन ने बताया कि 25 फरवरी को शिव विहार में शाम के वक्त उनके मामा घर से बाहर गए थे, तभी उपद्रवियों ने उनके सिर में गोली मार दी। इसके बाद वे जीटीबी अस्पताल लेकर आए, जिसके बाद 26 फरवरी की शाम को उन्होंने दम तोड़ दिया।

करतारपुर निवासी इरफान भी घर से बाहर निकला था, लेकिन वापस नहीं लौटा। मोहम्मद फुरकान ने बताया कि इरफान अपने बच्चों के लिए दूध लेने निकला था, लेकिन वापस नहीं आया। इरफान का शव भी दो दिन से मोर्चरी में रखा हुआ है। ऐसी ही कहानी है ब्रिजपुरी निवासी मेहताब की।

मेहताब की बहन सायरा बताती हैं कि उनके भाई का शव तीन दिन से जीटीबी की मोर्चरी में है, लेकिन अब तक नहीं मिला है। उन्होंने बताया कि मेहताब मंगलवार को दूध लेने बाहर गया था। दूध जब नहीं मिला तो वह वापस आया। इस बीच घर में टीवी पर जब हिंसा की खबर देखी तो वह जल्दी से गेट बंद करने के लिए दौड़ा। इसी बीच कुछ लोग हेल्मेट लगाए हुए थे, वे घर के बाहर आए और गोली मार दी। इसके बाद चाकू से वार किया। 
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