डीयू प्रोफेसर के माथे से 15 साल बाद धुला यौन शोषण का कलंक, मिलेगा पूरा वेतन-भत्ता
15 वर्ष बाद धुला यौन शोषण का कलंक, डीयू प्रोफेसर बरी
हाईकोर्ट ने माना, परेशान करने का हर मामला नहीं होता यौन शोषण, डीयू को सभी भत्ते देने का निर्देश
कहा, शिकायत में मात्र परेशान करने का था आरोप न कि यौन शोषण
नई दिल्ली।
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दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग प्रमुख प्रो. एसपी नारंग को अपने अधीन शोध कार्य करने वाली दो महिलाओं को डांटना काफी महंगा पड़ गया। उन्हें यौन शोषण के आरोप का ही सामना नहीं करना पड़ा बल्कि नौकरी भी गंवानी पड़ गई।
अब 15 वर्ष के बाद हाईकोर्ट ने डीयू के फैसले को रद्द कर उन पर लगे कलंक को धो दिया। अदालत ने कहा कि प्रो. नारंग पर यौन शोषण का नहीं बल्कि मात्र परेशान करने का आरोप लगाया गया था और हर परेशान करने का अर्थ यौन शोषण नहीं होता।
न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव ने अपने फैसले में प्रो.नारंग की डीयू के फैसले को चुनौती याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि शोषण की परिभाषा को तय किया जाना जरूरी था। पेश मामले में ऐसा नहीं है कि याची ने यौन उत्पीड़न किया या फिर कोई डिमांड की। शिकायत में मात्र डांटते थे शब्द हैं।
अदालत ने कहा-डीयू ने जांच में कोई नियम तय नहीं किए और याची को जांच रिपोर्ट तक नहीं दी। इतना ही नहीं शिकायतकर्ता से जिरह का मौका तक नहीं दिया गया। ऐसे में डीयू की याची को 4 मार्च 2002 में सेवा से वंचित करने संबंधी फैसले को खारिज किया जाता है।
अदालत ने याची नांरग के अधिवक्ता आरके सैनी व वरुण नागरथ के उस तर्क को स्वीकार कर लिया कि दोनों महिला शोधकर्ताओं ने शिकायत में मात्र इतना ही कहा था कि प्रो. नांरग उन्हें डांटते हैं।
वर्तमान में उनकी आयु 75 वर्ष है
अधिवक्ता सैनी ने कहा कि काम सहीं ढंग से नहीं करने और उनके मुवक्किल के यूएसए जाने के दौरान दोनों महिला शोधकार्ताओं ने छुट्टी व अन्य दस्तावेज ठीक ढंग से संभाल कर नहीं रखे और उनके मुवक्किल ने इस पर नाराजगी जताई थी जो एक सामान्य प्रक्रिया है।
जबकि डीयू ने कहा कि उसने तय प्रक्रिया का पालन किया। साथ ही कहा कि यदि प्राकृतिक न्यायिक प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ तो मामले को पुन: जांच कमेटी के पास भेजा जा सकता है।
प्रो.नारंग के अधिवक्ता सैनी व नागरथ ने आपत्ति जताते हुए कहा कि मामला 2001 का है और उनका मुवक्किल 16 वर्ष से अपने पर लगे कलंक को हटाने के लिए संघर्ष कर रहा है। उन्हें जब सेवा से हटाया गया उनकी आयु 60 वर्ष थी और वर्तमान में वे 75 वर्ष के हैं।
ऐसे में उनके मुवक्किल को सामान्य सेवानिवृत्ति का आदेश दिया जाए क्योंकि जब उन्हें सेवा से हटाया गया उनका कार्यकाल दो वर्ष शेष था। अदालत ने उनके तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि यदि पुन: जांच कमेटी के पास मामले को भेजा गया तो शिकायतकर्ता को भी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ सकता है।
इसके अलावा यदि याची को पुन: दोषी माना गया तो पुन: अपील में जाने के कारण बिना कारण सुनवाई के बाद समय लग सकता है। ऐसे में उनका मानना है कि मामले को यहीं खत्म कर दिया जाए। अदालत ने डीयू को याची को सेवानिवृत्त मानते हुए सभी भत्ते देने का निर्देश दिया है।