एक तरफ सम्मान, दूसरी तरफ यह अपमान क्यों..., सैनिकों के परिवारों में निराशा और मायूसी
एक तरफ सम्मान और दूसरी तरफ यह अपमान क्यों... यह अल्फाज हैं 80 साल के कुंदन लाल तनेजा के। जिनके सामने अब आशियाना उजड़ने का खतरा मंडरा रहा है। 1962 में चीन के साथ युद्ध के दौरान चोट लगने से अपाहिज हुए कुंदन लाल उसी दिन से बिस्तर पर हैं और उनकी पत्नी सेवा कर रही हैं।
नारायणा के सैनिक सदन में कुंदन लाल तनेजा जैसे 23 सैनिकों के परिवारों को 1968 में आवास मुहैया कराए गए थे। जिन्हें खाली कराने के लिए अब राज्य सैनिक बोर्ड ने बिना हस्ताक्षर और बिना स्टाम्प के नोटिस जारी किए हैं। इससे शहीद और दिव्यांग हुए सैनिकों के परिवारों में निराशा और मायूसी है। वे सरकार से न्याय की गुहार लगा रहे हैं। 1965 में पाकिस्तान से युद्ध में शहीद हुए रिछपाल का परिवार भी यहां रहता है। जिन्हें सरकार ने अशोक चक्र से सम्मानित किया था। उनके पुत्र अशोक का कहना है कि सरकार ने करगिल में शहीद हुए सैनिकों के परिवार को सम्मान दिया है क्या उसे भी पचास साल बाद वापस ले लेगी। ऐसे में कौन अपने देश की सेवा करने के लिए आगे आएगा? यहां सैनिक सदन में रहने वाले सभी परिवारों की दिल छू लेने वाली कहानी है।
बच्चे का जन्म होते ही जंग का एलान, पिता शहीद
सैनिक सदन में विजय लुकड़ा का परिवार भी रहता है। विजय के पैदा होते ही 1962 में चीन के साथ जंग का एलान हो गया। पिता चांदगी राम ने युद्ध में देश की रक्षा के लिए अपनी जान गंवा दी। विजय ने इसी सदन में अपने पिता की यादों और तस्वीरों को देखकर जिंदगी गुजार दी। अब आशियाना उजड़ने के खतरे ने उन्हें तोड़कर रख दिया है।
तत्कालीन प्रधानमंत्री ने जताई थी संवेदना
जाट रेजीमेंट में तैनात श्रीभगवान 1965 की लड़ाई में शहीद हुए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अपने हाथ से पत्र लिखकर उनकी पत्नी शांति देवी को सांत्वना दी थी। वह पत्र दिखाते हुए उनके भाई ओमप्रकाश की आंखों में आंसू आ गए।
शासन प्रशासन और जन प्रतिनिधियों से लगा रहे गुहार
पीड़ित परिवार शासन प्रशासन और जन प्रतिनिधियों से मदद की गुहार लगा रहे हैं। इन परिवार का दुख बांटने के लिए क्षेत्रीय विधायक विजेंद्र गोयल भी पहुंचे। उन्होंने आश्वासन दिया है कि दिल्ली सरकार इस मामले से दिल्ली के उपराज्यपाल को अवगत कराएगी।
राज्य सैनिक बोर्ड के अधिकारी कुछ भी कहने से बचते रहे
राज्य सैनिक बोर्ड के अधिकारी इस बाबत कोई भी आधिकारिक बयान देने से इंकार कर रहे हैं। एक अधिकारी ने नाम न छापने के शर्त पर बताया कि सैनिक सदन में एक्स सर्विस मैन को सिर्फ पांच साल के लिए आवास दिया था न कि उनके परिवार को। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2013 में ऐसे घरों को खाली करने का आदेश भी दिया था। अब सवाल यह उठता है अगर यह आवास महज पांच साल के लिए दिए गए थे तो इन्हें तभी खाली क्यों नहीं कराया। अब 51 साल बाद यहां रहने वाले कहां जाएंगे, इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है।