Delhi: प्रतिबंध के बावजूद चीनी मांझे की बिक्री में कमी नहीं, चोरी-छिपे एडवांस बुकिंग कर खरीद रहे हैं लोग
चीनी मांझा प्रतिबंधित है लेकिन अगर आपकी पहचान दुकानदार से है तो वह मुहैया करा रहे हैं। यह वैसे ही उपलब्ध है जैसे पटाखे पर बैन के बावजूद दीपावली के दिन जमकर पटाखे जलते हैं।
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तिबंध के बावजूद चीनी मांझा बाजार में उपलब्ध है। इसके साथ ही प्लास्टिक वाले धागे पर शीशे का लेप लगाकर देशी मांझे भी बनाए जा रहे हैं, जो चीनी मांझे के नाम से बिक रहे हैं और वह भी उतने ही धारदार हैं जैसे चीनी मांझा होता है। बाजार में सीधे तौर पर तो नहीं, लेकिन चोरी-छिपे और एडवांस पैसा देकर बुक करने मिल जाते हैं।
बड़े-बड़े दुकानों पर इस तरह का मांझा खुलेआम तो नहीं बेचा जा रहा, लेकिन गली-मोहल्लों की दुकानों में इसकी बिक्री की जा रही है। सबसे अधिक इसकी बिक्री अनाधिकृत कॉलोनियों में की जा रही है। कई दुकानदार तो यह जानते भी नहीं है कि इस पर प्रतिबंध है।
दुकानदार से पहचान है तो मुहैया हो रहा
चीनी मांझा प्रतिबंधित है लेकिन अगर आपकी पहचान दुकानदार से है तो वह मुहैया करा रहे हैं। यह वैसे ही उपलब्ध है जैसे पटाखे पर बैन के बावजूद दीपावली के दिन जमकर पटाखे जलते हैं। लाल कुंआ का इलाका हो या जामा मस्जिद, सदर बाजार समेत पूर्वी दिल्ली का इलाका, यहां 10 रुपये से लेकर 1500 रुपये तक में मांझे की बिक्री हो रही है। हालांकि इस मांझा को खरीदने के लिए एडवांस बुकिंग करनी पड़ेगी। मांझा की बिक्री करने वाले एक दुकानदार ने नाम नहीं बताने की शर्त पर बताया कि चीनी मांझे पर पाबंदी है इसलिए दुकानदार खुलेआम इसकी बिक्री नहीं कर रहे हैं।
मजबूती के कारण मांग है चीनी मांझे की
एक दुकानदार का कहना है कि चीनी मांझा नायलॉन, प्लास्टिक व सिंथेटिक, मेटेलिक से बना होता है। इस पर शीशे के कण का लेप लगा दिया जाता है, ताकि काफी धारदार और मजबूत हो सके। हालांकि देशी मांझे भी कम खतरनाक नहीं हैं। चीनी मांझे की तरह मजबूत तो नहीं होता लेकिन इसे भी धारदार बनाने के लिए शीशे के कण का लेप चढ़ाया जाता है। गर्दन में यह भी धागा लिपटता है तो खतरनाक हो जाता है। पतंग उड़ाते वक्त उंगलियां भी कट जाती हैं।
200 से लेकर 1000 रुपये में पूरी चकरी
पतंग उड़ाने वाले कहते हैं कि चीन का मांझा प्लास्टिक का होता है। मजबूत होने के कारण पतंग कम कटती हैं। ज्यादा दूर तक पतंगों के जाने पर डोर टूटने का डर नहीं होता है। दुकानदारों से मजबूत और अच्छा मांझा मांगने पर ज्यादातर दुकानदार चीन का मांझा सस्ता होने की वजह से दे देते हैं। वहीं दुकानदारों का कहना है कि बचत अच्छी होती है। 200 से लेकर 1000 रुपये में पूरी चकरी आ जाती है। इस चकरी में से मांग के आधार पर मांझे की बिक्री की जाती है।
जांच का विषय है कि देशी मांझा है या चीनी
फेडरेशन ऑफ सदर बाजार ट्रेडर्स एसोसिएशन के चेयरमैन परमजीत सिंह पम्मा कहते हैं कि चीनी मांझे पर तो पूरी तरह प्रतिबंध है लेकिन देशी मांझे को भी चीन की तरह ही निर्मित किया जा सकता है। मांझे पर भले ही प्रतिबंध है, लेकिन नायलॉन वाले धागे पर नकल करके चीन की तरह ही मांझे बनाए जा सकते हैं। लिहाजा यह जांच का विषय है कि मांझा किस तरह का है। जो भी चीनी मांझे की बिक्री कर रहा है उस वजह से सभी व्यापारी बदनाम होते हैं। कई लोग देशी मांझे को ही चीनी मांझा कहकर बिक्री कर देते हैं।
चीनी मांझे पर सख्ती बेहद जरूरी
दिल्ली व्यापार महासंघ के अध्यक्ष देवराज बावेजा का कहना है कि चीनी मांझे पर सख्ती बेहद जरूरी है। जिस घर का सदस्य इस मांझे का शिकार होता है वहीं इसका दर्द समझ सकता है। पंद्रह अगस्त आते ही दुर्घटनाएं शुरू हो जाती हैं। इस पर सख्ती होनी चाहिए। स्त्रोत पर रोक लगनी चाहिए ताकि किसी तक यह मांझा पहुंच नहीं सके।
पुलिस को सक्रिय होने की जरूरत
सदर निष्काम वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष हरजीत सिंह छाबरा कहते हैं कि सरकार को सख्ती बरतने की आवश्यकता है। पुलिस जब तक सक्रिय नहीं होगी तब तक रोक मुश्किल है क्योंकि जो चीजें बैन होती हैं, उसे उतना ही पसंद किया जाता है। जिस इलाके में इस तरह के मांझे बिकते हैं वहां सख्ती होनी चाहिए।
कुछ व्यापारी नाम नहीं बताने की शर्त पर बताते हैं कि लाल कुआं में सबसे अधिक इस तरह के मांझे बिकते हैं, अगर वहां सख्ती हो जाए तो दिल्ली में चीनी मांझे का स्त्रोत ही खत्म हो जाए। कंटेनर में छिपाकर इस तरह के धागे चीन से भारत में आते हैं।