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Delhi: करवा चौथ पर पत्नी का व्रत न रखना क्रूरता नहीं, हाई कोर्ट ने कहा- पति इस आधार पर नहीं तोड़ सकता संबंध

Fri, 22 Dec 2023 07:26 PM IST
श्याम जी. अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: श्याम जी. Updated Fri, 22 Dec 2023 07:26 PM IST
सार

दिल्ली हाई कोर्ट ने सभी तथ्यों पर विचार किया और माना कि पत्नी का आचरण साथ ही हिंदू संस्कृति में प्रचलित रीति-रिवाजों का पालन न करने का उसका निर्णय, जो पति के लिए प्यार और सम्मान का प्रतीक है। इस निष्कर्ष का समर्थन करता है कि उसके मन में अपने पति के लिए कोई सम्मान नहीं है। 

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Delhi High Court said that not keeping wife fast on Karva Chauth is not cruelty
सांकेतिक तस्वीर।

विस्तार

दिल्ली हाईकोर्ट ने माना कि करवा चौथ पर उपवास न करना एक व्यक्ति की पसंद है और यह न तो क्रूरता है और न ही वैवाहिक संबंधों को तोड़ने के लिए पर्याप्त। अदालत ने कहा कि अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं रखना और कुछ धार्मिक कर्तव्यों का पालन न करना भी अपने आप में क्रूरता नहीं है। हालांकि, पीठ ने इस मामले में पति द्वारा तलाक की याचिका की अनुमति देने के पारिवारिक न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा, क्योंकि तथ्यों पर समग्र विचार करने पर यह स्पष्ट है कि पत्नी को पति और उनके वैवाहिक बंधन के प्रति कोई सम्मान नहीं है।

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न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और नीना बंसल कृष्णा की खंडपीठ ने कहा करवा चौथ पर उपवास करना या न करना एक व्यक्तिगत पसंद हो सकता है और अगर निष्पक्षता से विचार किया जाए तो इसे पति के प्रति क्रूरता नहीं कहा जा सकता है। अलग-अलग धार्मिक विश्वास होने और कुछ धार्मिक कर्तव्यों का पालन न करने पर क्रूरता नहीं होगी या वैवाहिक बंधन को तोड़ने के लिए यी पर्याप्त नहीं है।
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पीठ ने एक महिला की अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणियां कीं, जिसने क्रूरता के आधार पर अपने अलग हो चुके पति को तलाक देने के पारिवारिक अदालत के आदेश को चुनौती दी थी। दोनों की शादी वर्ष 2009 में हुई और 2011 में विवाह से एक बेटी का जन्म हुआ। हालांकि पति ने कहा कि शादी की शुरुआत से ही पत्नी का आचरण उदासीन था और उसे अपने वैवाहिक दायित्वों के निर्वहन में कोई दिलचस्पी नहीं थी। 
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कई अन्य आधारों के अलावा पति ने यह भी कहा कि 2009 के करवा चौथ के दिन पत्नी उससे नाराज हो गई और उसने व्रत न करने का फैसला किया क्योंकि उसने उसका फोन रिचार्ज नहीं किया था। यह भी आरोप लगाया गया कि अप्रैल में जब पति को स्लिप डिस्क हो गई तो पत्नी ने उसकी देखभाल करने के बजाय अपने माथे से सिंदूर हटा दिया। चूड़ियां तोड़ दीं और सफेद सूट पहन लिया और घोषणा की कि वह विधवा हो गई है।

अदालत ने सभी तथ्यों पर विचार किया और माना कि पत्नी का आचरण साथ ही हिंदू संस्कृति में प्रचलित रीति-रिवाजों का पालन न करने का उसका निर्णय, जो पति के लिए प्यार और सम्मान का प्रतीक है। इस निष्कर्ष का समर्थन करता है कि उसके मन में अपने पति के लिए कोई सम्मान नहीं है।  कोर्ट ने आगे कहा कि एक पति के लिए इससे अधिक दुखद अनुभव कुछ नहीं हो सकता कि वह अपने जीवनकाल में अपनी पत्नी को एक विधवा की तरह व्यवहार करते हुए देखे। वह भी तब जब वह गंभीर रूप से घायल हो गया था। 


उच्च न्यायालय ने कहा 'निस्संदेह पत्नी के ऐसे आचरण को पति के प्रति अत्यधिक क्रूरता का कार्य ही कहा जा सकता है।' अदालत ने कहा कि पत्नी ने अपने पति और उसके वृद्ध माता-पिता के खिलाफ आपराधिक शिकायतें दर्ज कीं, लेकिन वह उन आधारों को सही नहीं ठहरा पाई जिन पर ये शिकायतें की गई थीं। यह भी देखा गया कि पत्नी ने शादी के बमुश्किल एक साल और तीन महीने के भीतर ही अपना वैवाहिक घर छोड़ दिया और उसने कोई सुलह प्रयास नहीं किया या वैवाहिक घर लौटने का प्रयास नहीं किया।

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