शाहीन बाग को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश केजरीवाल, मोदी की असफलता का प्रमाण: शर्मिष्ठा मुखर्जी
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कांग्रेस की स्टार प्रचारक शर्मिष्ठा मुखर्जी पार्टी के लोकप्रिय चेहरों में से एक हैं। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने दिल्ली प्रदेश महिला मोर्चा की अध्यक्ष होने के नाते महिला सुरक्षा से जुड़े कई गंभीर मुद्दे जनता के सामने उठाए हैं और इस तरह अपनी अलग पहचान बनाई है। दिल्ली विधानसभा चुनाव के बीच हमारे विशेष संवाददाता अमित शर्मा ने उनसे विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की। प्रस्तुत है वार्ता के प्रमुख अंश-
प्रश्न- अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि यह चुनाव पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क के मुद्दे पर लड़ा जाएगा। लेकिन बीजेपी और आम आदमी पार्टी अब शाहीन बाग और एनआरसी पर उलझते दिख रहे हैं। आपको क्या लगता है, शाहीन बाग का मुद्दा इस चुनाव को कितना प्रभावित करेगा?
इसे सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन के तौर पर मत देखिए। यह केंद्र सरकार की विभाजनकारी नीतियों, बेरोजगार युवाओं, शिक्षा से वंचित किए जा रहे छात्रों का इकट्ठा गुस्सा है। अब उन्हें समझ में आ रहा है कि यह सरकार उन्हें विकास देने की बजाय एक भटकाव की दिशा में ले जा रही है जहां उसको न तो नौकरी मिल रही है और न ही उनका भविष्य सुरक्षित है। शिक्षा संस्थानों में लाठियां बरसाई जा रही हैं और बाहर से आकर गुंडे छात्रों को पीट रहे हैं। छात्र इस बात से हताश हैं कि सरकार सब कुछ देखते हुए भी मौन है। कुछ दिन लोगों ने बर्दाश्त किया लेकिन अब इसके बहाने उनका गुस्सा सामने आ रहा है। और इन सब मुद्दों का चुनाव पर असर अवश्य पड़ेगा।
प्रश्न- क्या शाहीन बाग के मुद्दे के सहारे चुनाव को सांप्रदायिक मोड़ देने की कोशिश की जा रही है?
बिल्कुल, बीजेपी और आप दोनों की तरफ से यह कोशिश हो रही है। शाहीन बाग के मुद्दे को सांप्रदायिक मोड़़ देने की कोशिश यह साबित करती है कि अरविंद केजरीवाल को इस बात का एहसास हो रहा है कि उनके फ्री बिजली, पानी का मुद्दा काम नहीं कर रहा है। अब वे इसके सहारे चुनाव लड़ने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं भाजपा के पास भी दिल्ली के विकास का कोई मॉडल नहीं है। वह लोगों को यह बताने में नाकाम साबित हुई है कि नरेंद्र मोदी की सरकार देश में क्या बड़ा बदलाव करने में सफल साबित हुई है। वह कोई विकास का मॉडल पेश नहीं कर पाई है और देश विकास, रोजगार, जीडीपी हर मोर्चे पर पीछे गया है। वह जनता को यह नहीं बता पा रही है कि अगर वह सरकार में आती है तो वह लोगों को क्या नया दे सकती है। यही कारण है कि आम आदमी पार्टी और भाजपा दोनों ही शाहीन बाग के मुद्दे के पीछे अपनी नाकामियां छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।
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प्रश्न- अगर शाहीन बाग के मुद्दे से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता है तो कांग्रेस पर इसका क्या असर पड़ेगा?
भाजपा और आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन मुझे लगता है कि यह सांप्रदायिक मामला नहीं है क्योंकि पूरे देश में एनआरसी और नागरिकता कानून के खिलाफ में सभी जातियों, धर्मों के लोग सड़कों पर उतरे हैं। असम में जिन लोगों की नागरिकता प्रभावित हुई है उनमें सबसे ज्यादा हिंदू लोग ही हैं। ऐसे में इसे सांप्रदायिक समझना भूल होगी। यह पूरे देश का गुस्सा है और इसका संपूर्णता में असर दिखाई पड़ेगा।
प्रश्न- भाजपा हर चुनाव में राष्ट्रवाद का नारा बुलंद करती है। क्या इस चुनाव में उसका यह नारा काम करेगा?
मैं आपसे पूछना चाहती हूं कि राष्ट्रवाद क्या होता है? जब देश विकास करे, छात्रों को शिक्षा और नौकरी मिले, जीडीपी में वृद्धि हो, आद्योगिक विकास हो, विश्व समुदाय में देश का मान बढ़े। आप इनमें से किस पैमाने पर देश को आगे बढ़ता देख रहे हैं? इस सरकार में देश हर मोर्चे पर पीछे गया है। आद्योगिक विकास, रोजगार में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की जा रही है। इसके बाद अब युवाओं का भी इस सरकार से मोहभंग हो गया है। भाजपा का राष्ट्रवाद फेल हो चुका है।
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प्रश्न- कांग्रेस की दिल्ली विधानसभा चुनाव को लेकर क्या तैयारियां हैं?
दिल्ली विधानसभा चुनाव में हमने मजबूत प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं। हमारे नेता-कार्यकर्ता लगातार जमीन पर मेहनत कर रहे हैं। हमने लोगों को शीला दीक्षित के विकास मॉडल की 'कांग्रेस वाली दिल्ली' देने का वायदा किया है। हम जीतेंगे और दिल्ली की रुकी विकास की गाड़ी दोबारा दौड़ाएंगे।
प्रश्न- कांग्रेस को अभी भी शीला दीक्षित के नाम का सहारा लेना पड़ रहा है। क्या यह आपके पास एक लोकप्रिय चेहरे की कमी नहीं दिखाता है?
शीला दीक्षित हमारी बड़ी नेता थीं। उनके नेतृत्व में ही हमने दिल्ली का विकास किया था। जाहिर है कि हमारे पास दिखाने के लिए उन्हीं का काम होगा, लेने के लिए उन्हीं का नाम होगा। उनका जाना पार्टी के लिए बड़ी क्षति है। फिलहाल, हम उनके काम को लेकर ही जनता के पास जा रहे हैं और उसी मॉडल पर वोट मांग रहे हैं। इसे हम अपनी ताकत के तौर पर देख रहे हैं।
प्रश्न- कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अभी भी प्रचार से दूर है जबकि भाजपा और आप ने सघन प्रचार की रणनीति अपना रखी है। क्या इसका नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा?
पार्टी में अनेकों बड़े नेता हैं और सभी लगातार कार्यक्रम, सभाएं कर रहे हैं। जहां तक पार्टी नेतृत्व का सवाल है उनका कार्यक्रम ऊपर स्तर से ही तय होता है। उसके विषय में मैं कुछ नहीं कह सकती।