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Report: पॉक्सो मामलों के निपटारे में दिल्ली की जिला अदालतों ने दिखाई रफ्तार, छत्तीसगढ़ पहले नंबर पर

Sun, 04 Jan 2026 06:00 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 04 Jan 2026 06:00 AM IST
सार

सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज फॉर चिल्ड्रन की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार मामलों के निस्तारण की दर 178 प्रतिशत रही।

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Delhi district courts show speed in disposal of POCSO cases
demo - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

राजधानी की जिला अदालतों ने वर्ष 2025 में बच्चों से जुड़े यौन अपराधों के मामलों को तेजी से निपटाया है। सेंटर फॉर लीगल एक्शन एंड बिहेवियर चेंज फॉर चिल्ड्रन की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार मामलों के निस्तारण की दर 178 प्रतिशत रही। हालांकि इस मामले में छत्तीसगढ़ राज्य पहले पायदान पर रहा। वर्ष 2025 में दिल्ली में पॉक्सो के तहत 1,006 नए मामले दर्ज हुए, जबकि इस दौरान अदालतों ने 1,792 मामलों का निपटारा किया।

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राष्ट्रीय स्तर पर भी अदालतों ने बेहतर प्रदर्शन किया। साल 2025 में देशभर में 80,320 नए पॉक्सो मामले दर्ज हुए, जबकि 87,754 मामलों का निपटारा किया गया, जिससे राष्ट्रीय निपटान दर 109 प्रतिशत रही। रिपोर्ट के अनुसार, 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में निपटान दर 100 प्रतिशत से अधिक दर्ज की गई। हालांकि रिपोर्ट में चिंता भी जताई गई है कि निपटान दर बढ़ने के बावजूद कई पुराने मामले अब भी लंबित हैं।
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600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतें बने तब चार साल में निपटेंगे लंबित मामले : पेंडेंसी से संरक्षण तक: यौन शोषण के शिकार बच्चों के न्याय के लिए टिपिंग पॉइंट हासिल करना शीर्षक से जारी रिपोर्ट में बताया गया कि सिर्फ दिल्ली में पॉक्सों के 54 प्रतिशत मामले छह से 10 साल से लंबित हैं।
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लंबे समय तक मामलों का लंबित रहना पीड़ित बच्चों के मानसिक आघात को और बढ़ाता है। इस बात का जिक्र रिपोर्ट में है। रिपोर्ट ने सुझाव दिया है कि चार साल के भीतर देशभर में पॉक्सो मामलों का बैकलॉग खत्म करने के लिए करीब 600 अतिरिक्त ई-पॉक्सो अदालतें बनाई जाएं। इसके लिए निर्भया फंड के उपयोग की भी सिफारिश की गई है। दिल्ली में केवल नए मामलों का निस्तारण नहीं हुआ, बल्कि पुराने लंबित मामलों पर भी ध्यान दिया गया।


हालांकि, रिपोर्ट में यह बताया गया है कि 54 प्रतिशत मामलों की लंबित अवधि छह से दस साल है।विशेषज्ञों के अनुसार, यह लंबित मामले बच्चों की सुरक्षा और न्याय के दृष्टिकोण से चिंताजनक हैं। अदालतों को इन मामलों को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि बच्चों के मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य को सुरक्षित किया जा सके।

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