Delhi election 2020: पहले 'बिहारी' अब पूर्वांचली, इनके इर्द-गिर्द ही सत्ता का समीकरण
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एक वक्त था जब दिल्ली में 'बिहारी' शब्द का प्रयोग अपशब्द के तौर पर किया जाता था। बिहार, झारखंड और पूर्वांचल के प्रवासियों को हीन भावना से देखा जाता था। और एक आज का वक्त है जब इस पट्टी के लोगों की आबादी ने दिल्ली की सामाजिक और आर्थिक दशा के साथ साथ राजनीतिक समीकरण में भी बड़ा उलटफेर ला दिया है।
पहले बिहारी, अब पूर्वांचली
अब इन क्षेत्रों से आने वाले वोटरों को 'पूर्वांचली' के नाम से संबोधित किया जाता है। इन्हीं के दम पर दिल्ली की सत्ता का समीकरण भी बनता है। दिल्ली के कुल मतदाताओं में पूर्वांचलियों की संख्या 30-32 प्रतिशत तक है। पूर्व में कांग्रेस के पास महाबल मिश्रा जैसे नेता थे, जिनके कारण कांग्रेस दिल्ली के पूर्वांचली वोटों की एकमात्र दावेदार थी। लेकिन पिछले ही दिनों महाबल मिश्रा ने अपने बेटे विनय मिश्रा के साथ आम आदमी पार्टी ज्वाइन कर लिया है।
2015 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने 'पूर्वांचली फैक्टर' को देखते हुए करीब दर्जन भर पूर्वांचली उम्मीदवारों को खड़ा किया था। हालांकि यह सब भ्रष्टाचार आंदोलन की आड़ में किया गया, लेकिन चुनाव में इसका व्यापक असर देखने को मिला। पूर्वांचली मचदाताओं ने बेहद सक्रियता के साथ चुनाव में भागीदारी दिखाई।
अब हालात ऐसे हैं कि लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए पूर्वांचली नेता सत्ता का सुलभ रास्ता बन गए हैं। इस बार आम आदमी पार्टी ने 12 पूर्वांचली उम्मीदवारों को टिकट दिया है। हालांकि इस बार भाजपा और कांग्रेस भी इसी वोट बैंक पर निशाना साधती नजर आ रही है।
मनोज तिवारी को दिल्ली भाजपा की कमान
आम आदमी पार्टी के 'पूर्वांचली कॉन्सेप्ट ने जिस तरह दिल्ली से कांग्रेस का सफाया कर दिया, उससे भाजपा को भी झारखंड, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आए लोगों की आबादी का अंदाजा हुआ। जिसके बाद पूर्वांचल के लोकप्रिय चेहरे मनोज तिवारी को दिल्ली प्रदेश की कमान सौंपी गई।
2015 के मुकाबले इस बार भाजपा ने अधिक पूर्वांचली उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। इस के साथ ही चुनाव में जदयू और लोजपा से साथ गठबंधन भी कर लिया है। इसके अलावा भाजपा के स्टार प्रचारकों की सूची में भी कई ऐसे नाम हैं जो पार्टी की रणनीति साफ करते हैं।
भाजपा ने प्रचारकों में झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, नित्यानंद राय मनोज तिवारी, निरहुआ, रवि किशन को शामिल किया है। ये सभी ऐसे नेता हैं जिनका पूर्वांचल के मतदाताओं पर सीधा असर पड़ सकता है।
हालांकि कांग्रेस इस मामले में थोड़ी कमजोर नजर आती है। पिछले पांच वर्षों से महाबल मिश्रा जैसे असरदार नेता को दरकिनार करने के बाद कांग्रेस को पूर्वांचलियों को साधने के लिए नए चेहरे की जरूरत थी, जिसके लिए उन्होंने कीर्ति आजाद का सहारा लिया। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद के बेटे कीर्ति आजाद को कांग्रेस ने दिल्ली विधानसभा चुनाव समिति का आध्यक्ष बनाया है।
ऐसे में देखना यह है कि अब 30-32 फीसदी की आबादी वाले पूर्वांचली मतदाता भाजपा, कांग्रेस और आप में से किसके खेमे में जाते हैं। उसी से पता चलेगा कि क्षेत्रीयता के आधार पर रणनीति करने में कौन सी पार्टी कितनी सफल हो पाई।