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दिल्लीः पूर्वांचलियों के वोटबैंक पर नजर, लेकिन बदहाली से बेखबर, अमानवीय हालात में रहते हैं मजदूर

Thu, 12 Dec 2019 10:09 AM IST
पूजा त्रिपाठी संतोष कुमार, अमर उजाला, नई दिल्ली
संतोष कुमार, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Thu, 12 Dec 2019 10:09 AM IST
सार

-पूरी दिल्ली में चल रही करीब एक लाख छोटी-बड़ी फैक्टिरियों में अमानवीय हालात में रहते हैं मजदूर इनमें ज्यादातर पूर्वांचली
-हादसों के बाद जागता है प्रशासन और सुध लेने पहुंचते हैं नेता, मामला ठंडा होने पर साध लेते हैं चुप्पी

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Delhi Assembly election 2020 eyes on purvanchal vote bank no concern on their issue living hell life
घनी आबादी वाले बाजार में पतली गलियां - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भईया, ऊपर जाकर देखो। 25-25 गज के मकान में फैक्टरी चल रही है। रहना भी वहीं होता है। एक-एक कमरे में दस-दस लोग, फर्श पर बिस्तर लगाकर सोते हैं। मालिक को पैसा चाहिए और नेता को सिर्फ वोट। दोनों का इससे ज्यादा का मतलब नहीं है।

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हमारी मजबूरी यह है कि हजार-हजार किमी दूर से घर-बार छोड़कर दिल्ली आए हैं। खुद का पेट भरने के साथ परिवार वालों को भी पैसा भेजना है तो किसी तरह गुजर कर लेते हैं। हादसा होने के बाद ही हम  पर लोगों की नजर पड़ती है। थोड़ा हंगामा होने के बाद फिर सब शांत हो जाते हैं।
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समस्तीपुर बिहार का अंजुमन रानी झांसी रोड के फुटपाथ पर बैठकर उस गली में नजरें गड़ाए हुआ था, जहां से दो दिन पहले 43 लोगों की लाशें गुजरी थीं। हादसे पर सवाल करने पर लडख़ड़ाती आवाज के साथ बोल पड़ा। और बोलते-बोलते उसकी आंखें डबडबा आईं।
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बीते तीन दिनों से दिल्ली के सियासी गलियारे में चल रही भागमभाग से अंजुमन की बातें मौंजू भी लगीं। चुनाव की दहलीज पर खड़ी दिल्ली के हर नेता ने अनाज मंडी से अस्पताल तक पहुंचकर पीड़ितों के गम का साझीदार बनने की कोशिश की है। ऐसा भी नहीं, यह नजारा पहली बार दिखा हो।

Delhi Assembly election 2020 eyes on purvanchal vote bank no concern on their issue living hell life
संकरी सीढ़ियां - फोटो : अमर उजाला

हर हादसे के बाद नेताओं में इसी तरह की होड़ लगती है। नेताओं की मशक्कत इसलिए भी अहम है कि मृतकों में ज्यादातर पूर्वांचल से ताल्लुक रखने वाले लोग हैं, जिनको बतौर वोट बैंक अपने पाले में लाने के लिए तीनों पार्टियां एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए हैं।

वोट देने के साथ वह रैलियों में भीड़ जुटाने का जरिया भी बनते हैं, लेकिन गरीब तबके के पूर्वांचलियों को कार्य स्थल से रिहायश तक में अमानवीय हालात का सामना करना पड़ता है।

राजनीतिक संरक्षण में चलता है पूरा धंधा
नाम उजागर न करने की शर्त पटपडग़ंज इंडस्ट्रियल एरिया के एक फैक्ट्री मालिक ने बताया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में सस्ते मजदूर मिल जाते हैं। इनके साथ यह दिक्कत नहीं कि वह अपना परिवार लेकर दिल्ली आए हों।

वह अकेले दिल्ली पहुंचते हैं। चूंकि दिल्ली में रहना और खाना महंगा है तो फैक्ट्री मालिक आवासीय इलाकों की तंग कमरों की फैक्टरी सह आवास बना देता है। कुछ ही दिनों में स्थानीय नेताओं की मदद से वह दिल्ली का वोटर भी बन जाता है। इसका दोनों को फायदा होता है।

छोटे-छोटे नेता कुछ वोटों के मालिक बन जाते हैं, जबकि फैक्टरी मालिक को नेता का संरक्षण। इसके बाद पूरा सिस्टम खामोश हो जाता है। खास बात यह कि मजदूरों कावोटर कार्ड फैक्टरी मालिक अपने पास रख लेता है। 

बड़ी संख्या में पूर्वांचली वोटर दिल्ली में कामगार

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फैक्ट्री की पतली सीढ़ियां - फोटो : अमर उजाला

बीते बीस साल से दिल्ली में काम कर रहे पूर्वांचल के मुकेश सिन्हा का कहना है कि दिल्ली में 40-45 लाख पूर्वांचली रहते हैं। इनमें कामगारों की संख्या 50-60 फीसदी है। दिल्ली में वह छोटी-बड़ी फैक्टरियों में काम करते हैं।

फैक्टरी मालिक कभी इन्हें झुग्गी बस्तियों में ठहरा देता है तो कई बार फैक्टरी ही रिहायश बन जाती है। अनाज मंडी सरीखे हादसों के बाद सिस्टम थोड़ा चुस्ती दिखाता है, लेकिन मामला ठंडा पड़ने के बाद जिम्मेदार अफसर भी शांत हो जाते हैं और नेता भी मुंह मोड़ लेते हैं।

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