Delhi AIIMS: सीने में धड़क रहा दूसरे का दिल, संजोकर रखना, एम्स में आयोजित हुआ पहला इवर ट्रांसप्लांट गेम्स
एम्स में फर्स्ट इवर ट्रांसप्लांट गेम्स का आयोजन किया गया। आयोजन में एम्स में हृदय प्रत्यारोपण करवाने वाले सभी मरीजों को बुलाया गया। इनमें ऐसे मरीज भी हैं जिनका 22 साल पहले प्रत्यारोपण हुआ और अब पूरी तरह से ठीक हैं और सामान्य लोगों की तरह जिंदगी बिता रहे हैं।
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अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में रविवार को ऐसे 29 लोग पहुंचे जिनके सीने में किसी दूसरे का दिल धड़क रहा है। अब ये लोग सामान्य जीवन बिता रहे हैं। इन लोगों के लिए यह दिल किसी वरदान से कम नहीं। शायद यहीं कारण है कि दोहरी जिम्मेदारी के साथ इस दिल का ख्याल रख रहे हैं।
दरअसल एम्स में फर्स्ट इवर ट्रांसप्लांट गेम्स का आयोजन किया गया। आयोजन में एम्स में हृदय प्रत्यारोपण करवाने वाले सभी मरीजों को बुलाया गया। इनमें ऐसे मरीज भी हैं जिनका 22 साल पहले प्रत्यारोपण हुआ और अब पूरी तरह से ठीक हैं और सामान्य लोगों की तरह जिंदगी बिता रहे हैं। नौकरी कर रहे हैं। खेलों में हिस्सा लेकर पदक जीत रहे हैं। इन मरीजों के लिए रस्साकशी, बैडमिंटन, नींबू दौड़, कैरम, चेस सहित अन्य खेलों का आयोजन हुआ। इसमें निदेशक सहित कॉर्डियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अंबुज राय सहित अन्य ने हिस्सा लिया।
डॉक्टरों का कहना है कि हृदय प्रत्यारोपण के बाद भी लोग सामान्य जिंदगी बिता सकते हैं। एम्स के निदेशक डॉ. एम श्रीनिवास ने बताया कि यह बढ़ा संदेश है हमारे समाज के लिए लोग यदि अंगदान को बढ़ावा देते हैं तो दूसरों की जिंदगी को बचाया जा सकता है। हृदय प्रत्यारोपण के बाद यह सभी सामान्य जिंदगी जी रहे हैं।
जनवरी 2001 में हृदय प्रत्यारोपण करवाने के बाद मैं अब दो जिंदगियों को बचा रही हूं, किसी ने बड़े दुख में अपना हृदय मुझे दिया है, इसे सहेजकर रखना मेरी जिम्मेदारी है। नया दिल मिलने के बाद मैं सामान्य जिंदगी जी रही हूं। मैं एम्स में काम करती हूं और अब कोई परेशानी भी नहीं है। प्रीति उनाहले, इंदौर
हृदय प्रत्यारोपण के कुछ दिन बाद से ही फिर से काम पर वापस लौट आया हूं। मुझे लगता ही नहीं कि दिल से जुड़ी समस्या हुई थी। हार्ट अटैक के बाद समस्या बढ़ गई थी। डॉक्टरों के सुझाव के बाद हाल ही एक मार्च को हृदय प्रत्यारोपण हुआ और अब पूरी तरह से ठीक हूं। दीपांशु गर्ग, गाजियाबाद
साल 2018 में हुए हृदय प्रत्यारोपण के बाद पूरी तरह से ठीक हूं। ऑस्ट्रेलिया में हुए वर्ल्ड प्रत्योरापण गेम में पदक जीतकर एक नई पहचान भी मिली है। डॉक्टरों की सलाह पर विशेष ध्यान रखना पड़ता है। मेरी समस्या को दादी ने चेहरे देख कर भाप लिया था, जांच करवाई तो दिल का मरीज मिला। एम्स में उपचार के बाद प्रत्यारोपण हुआ और अब जिंदगी को सामान्य तरह से जी रहा हूं। राहुल, बागपत
बचपन से दिल में छेद था। शुरुआत में समस्या का पता नहीं चला। समस्या बढ़ी तो करीब 12 साल की उम्र में एम्स में दिल की बीमारी का पता चला। यहां पर पहले सर्जरी हुई। पांच साल तक ठीक रहने के बाद फिर दिक्कत हुई। तीन बार सर्जरी होने, पेसमेकर लगने के बाद भी आराम नहीं मिला तो साल 2018 में हृदय प्रत्यारोपण करवाया। अब पूरी तरह ठीक हूं। शरोन कबरल, गाजियाबाद
एम्स में कार्डियो थोरैसिक और वैस्कुलर सर्जरी (सीटीवीएस) के प्रोफेसर डॉक्टर मिलिंद होते ने बताया कि प्रत्यारोपण के बाद सभी सामान्य जिंदगी जी रहे हैं। एक मृत व्यक्ति से मिलने वाले अंग से कई लोगों की जिंदगी बचा सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि 100 अंगदान होते हैं तो 90 फीसदी से लिवर और किडनी मिल जाती हैं। 70 फीसदी में हार्ट डोनेट हो जाता है। जबकि 15 फीसदी से ही लंग्स मिल पाता है। ऐसे में अंगदान में भी सुधार होना चाहिए जिससे अंगदान को बढ़ावा मिलेगा।
एम्स में अब तक 85 मरीजों का हृदय प्रत्यारोपण हो चुका है। इनमें से 29 मरीज रविवार को प्रत्यारोपण खेल महोत्सव में आए। एम्स के कार्डियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. संदीप सेठ ने बताया कि 22 साल पहले हुए हृदय प्रत्यारोपण का मरीज पूरी तरह से स्वस्थ है। वह सामान्य जिंदगी जी रहा है। हमारी कोशिश है कि एम्स में हृदय प्रत्यारोपण को बढ़ावा देने के लिए अंगदान को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाए।
एम्स में हृदय प्रत्यारोपण के लिए 12 से 13 मरीजों को प्रतीक्षा सूची में रखते हैं। इनके लिए तीन माह से एक साल तक की वेटिंग है। उन्होंने कहा कि हृदय के 90 फीसदी तक मरीज दवा से ही ठीक हो जाते हैं। एक बार जो मरीज संभल जाता है वह पूरी तरह ठीक भी हो जाता है। ऐसे मरीजों के लिए हर साल एक नई दवा तैयार हो रही है। देश में करीब लाखों की संख्या में हार्ट फेलियर्स के मरीज हैं। इनमें हजारों लोगों को हृदय प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है, लेकिन सभी को अंग नहीं मिल पाता। ऐसे में दवा के सहारे उन्हें ठीक किया जाता है। 10 फीसदी में से कुछ मरीजों को हृदय प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है। इस प्रत्यारोपण में करीब डेढ़ लाख का खर्च आता है। इसके बाद छह माह तक ज्यादा दवा चलती है जिसमें 30 से 40 हजार का खर्च हर माह आता है। उसके बाद यह काफी कम हो जाता है।