केन्द्रीय विद्यालय से हटी जर्मन, पेरेन्ट्स परेशान
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देश के केन्द्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के रुप में जर्मन की जगह संस्कृत भाषा पढ़ाये जाने के फैसले को लेकर पेरेंट्स चिंता में हैं। इन्हें लगता है आनन फानन में लिया गया ये फैसला बच्चों के भविष्य के लिए सही नहीं है।
अब तक जर्मन भाषा को सभी केन्द्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के रुप में पढ़ाया जाता था, लेकिन अब से इसकी जगह संस्कृत भाषा को तीसरी भाषा के रुप में शामिल किया गया है।
जर्मन की जगह संस्कृत पढ़ाने के फैसले को मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी के नेतृत्व में लिया गया है। वहीं पेरेन्ट्स का कहना है कि सरकार को भाषा बदलने के इस फैसले को अगले सत्र में शामिल करना चाहिए था। इससे तो बच्चों की पढ़ाई का नुकसान होगा।
देश भर में 500 से ज्यादा केन्द्रीय विद्यालयों में जर्मन भाषा पढ़ाई जाती है। केन्द्र सरकार के अनुसार भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ये फैसला लिया गया है।
फैसले से इन्हें है एतराज
जहां कई संगठन इस फैसले का सम्मान कर रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर विरोध के स्वर भी उभरे हैं। तमिलनाडु की पार्टी पीएमके के नेता एस रामदॉस ने इसके ख़िलाफ़ आंदोलन की धमकी दी है।
इसके अलावा एग्जाम्स से ठीक पहले लिये गये इस फैसले ने स्टूडेन्ट्स को भी परेशानी में डाल दिया है क्योंकि अभी तक वो जर्मन भाषा पढ़ते आए, थे लेकिन कुछ समय बाद ही उन्हें संस्कृत का पेपर देना होगा।
इस फैसले के लागू होने से कक्षा छह से आठ तक के हज़ारों विद्यार्थियों को जर्मन की जगह संस्कृत का पेपर देना होगा। ये फैसला त्रिभाषा सूत्र के तहत किया गया है जिसमें अंग्रेजी के अलावा दो अन्य भारतीय भाषाएं पढ़ाने की बात की गयी है।