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Delhi High Court : अदालत ने कहा- पत्नी स्नातक ...सिर्फ इसलिए काम करने को मजबूर नहीं कर सकते
Thu, 26 Oct 2023 05:42 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Thu, 26 Oct 2023 05:42 AM IST
सार
यह भी नहीं माना जा सकता है कि वह जानबूझकर अपने अलग हो रहे पति से भरण-पोषण का दावा करने के लिए काम नहीं कर रही है।
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delhi high court
- फोटो : ANI
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विस्तार
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि पत्नी स्नातक है उसे काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। यह भी नहीं माना जा सकता है कि वह जानबूझकर अपने अलग हो रहे पति से भरण-पोषण का दावा करने के लिए काम नहीं कर रही है।
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अदालत एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने पत्नी को मिलने वाले अंतरिम गुजारा भत्ते को इस आधार पर 25,000 रुपये प्रति माह से घटाकर 15,000 करने की मांग की थी कि उसके पास बीएससी की डिग्री है। जस्टिस सुरेश कुमार कैत की पीठ ने कहा, इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि पत्नी स्नातक है, लेकिन उसे कभी भी लाभकारी रोजगार नहीं मिला और परिवार अदालत से निर्धारित अंतरिम गुजारा भत्ता में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है।
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भुगतान में देरी पर जुर्माना रद्द
हालांकि, अदालत ने पति की ओर से अंतरिम भरण-पोषण के भुगतान में देरी पर 1,000 रुपये प्रतिदिन के जुर्माने को रद्द कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण के विलंबित भुगतान के लिए 6 फीसदी प्रति वर्ष की दर से ब्याज का भुगतान किया जाए। पीठ ने मुकदमेबाजी लागत के भुगतान में देरी पर लगाए गए 550 रुपये प्रति दिन के जुर्माने को भी रद्द कर दिया।
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जैविक पिता ही बच्चों के भरण-पोषण के लिए जिम्मेदार
एक अन्य आदेश में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि कानूनन जैविक पिता ही बच्चे के भरण-पोषण के लिए उत्तरदायी है। हाईकोर्ट ने हाल ही में निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें दोनों पक्षों की शादी के एक महीने बाद पैदा हुए बच्चे को गुजारा भत्ता देने से मना कर दिया गया था। हाईकोर्टे ने उस डीएनए रिपोर्ट पर गौर किया जिसमें कहा गया था कि याचिकाकर्ता का पति उसके बच्चे का जैविक पिता नहीं है।