कोरोना क्या करेगा साहब! डर लगे या आफत आ ही जाए...ड्यूटी है, निभानी पड़ेगी
- डीटीसी बस हो या मदरडेरी बूथ सब चल रहा है
- दिल्ली पुलिस से लेकर संसद, मंत्रालय भवनों तक मुस्तैद हैं जवान
- अस्पताल बंद हो जाएं, तो लोग कहां जाएंगे
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जीवटता और सेवा का भाव चलती फिरती जिंदगी का बड़ा सहारा होता है। कंडक्टर विनोद हो या चालक धर्मेंद्र मुंह पर मास्क लगाए यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचा रहे हैं। मन में कोरोना को लेकर डर भी है। हालांकि बसें रोज सेनेटाइज हो रही हैं।
उन्हें यह भी नहीं पता कि मुंह पर लगा मास्क या सुरक्षा के ये उपाय कितना पर्याप्त हैं, लेकिन पूछने पर साफ कहते हैं कि साहब डर लगे या आफत आए...ड्यूटी है, निभानी पड़ेगी। ट्रैफिक पुलिस में हेड कांस्टेबल प्रमोद कुमार का कहना है कि वह तो आपात सेवाओं में आते हैं। वह घर बैठ जाएंगे तो लोगों को दिक्कत हो जाएगी।
दिल्ली के हिंदूराव अस्पताल में डा. प्रो. राम कहते हैं यहां वर्क टू होम नहीं हो सकता। यह हमारा काम है। सामने मौत खड़ी होगी तब भी एक बार उसका हालचाल लेने जाना ही होगा। एंबुलेंस सेवा देने वाले फारुख का कहना है कि चाहे कोरोना हो कोई और हव्वा, जो हमारा काम है, उसे बचाव के उापय के साथ करना है।
होम्योपैथिक डा. सुधीर तोमर लोगों को कोराना से बचाव की दवा देने के लिए लगाार सक्रिय हैं। आप आगे बढ़िए। मदर डेरी के बूथ पर रामपाल पूरी तरह से सक्रिय हैं। पहले वह साढ़े पांच बजे आ जाते थे। पिछले दो-तीन दिन से पांच बजे ही आ रहे हैं। ताकि लोगों को कोई तकलीफ न हो।
रामपाल का कहना है कि उनके पास ऐसे ग्राहक आ रहे हैं, जो दूध की थैली ही नहीं छू रहे हैं। वह सीधे अपने थैले में दूध की थैली डाल रहे हैं।
सुरक्षा बलों के हौसले को सलाम
दिल्ली पुलिस के जवान हों या सीआरपीएफ, बीएसएफ, सीआईएसएफ के जवान। दिल्ली के पुलिस थाना, रेडलाइट, संसद भवन, मंत्रालयों के भवन तक पूरी मुश्तैदी से तैनात हैं। सीआरपीएफ के वेंकटेश बताते हैं कोरोना को लेकर एक नई एडवाइजरी आई है।
हम सब उसका पालन करते हैं। कुछ जवान मास्क लगाए मिले तो कुछ एहतियात बरतते हुए। पूछने पर बताया कि समय-समय पर साबुन से हाथ धोना, लोगों से दूरी बनाकर बात करना और अधिकारियों के दिशा-निर्देश का वह लगातार पालन कर रहे हैं।
डर है...लेकिन कामकाज के सामने सब फेल
सीआरपीएफ के हेड कांस्टेबल का कहना है कि अभी फौज में कोरोना नहीं सुनाई पड़ा है, लेकिन यदि सुरक्षा बलों में आ गया तो मुश्किल होगी। सूत्रों का कहना है कि हमारा खाना, पीना, उठना बैठना, पानी पीना सब सामूहिक होता है। मेस में बना खाना ही ड्यूटी के जवानों की लाइफ लाइन की तरह है।
इसलिए यदि सुरक्षा बलों में इसकी शिकायत आई तो मुश्किल होगी। कुछ इसी तरह का डर क्लस्टर बस, डीटीसी बस के चालकों, पुलिस के स्टाफ में भी दिखा।