हरियाणा चुनाव: कहीं फिर से न डूब जाए कांग्रेस की नैया
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राजनीतिक पंडित इस बार हरियाणा में कांग्रेस के पक्ष में वह हवा चलती नहीं देख रहे हैं जो उसे सत्ता तक पहुंचाती रही है। पार्टी के कई बड़े नेताओं के किनारा कर लेने से चुनौती और भी बढ़ गई है।
हरियाणा के इतिहास में विधानसभा चुनावों के आंकड़े भी बताते हैं कि कांग्रेस यहां या तो अर्श पर होती है या फर्श पर। ऐसे में कांग्रेस के साथ-साथ यह हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के अस्तित्व की बड़ी लड़ाई होगी। इसलिए टिकट वितरण को लेकर आलाकमान बड़ा मंथन कर रहा है।
हरियाणा गठन के बाद वर्ष 1967 में कांग्रेस को 81 विधानसभा क्षेत्रों में से 48 सीटें जीतने पर बहुमत मिला था। पं. भगवत दयाल शर्मा हरियाणा की कांग्रेस सरकार के पहले मुख्यमंत्री बने थे। यह सरकार 9 माह चली और वर्ष 1968 के मध्यावधि चुनाव में फिर से कांग्रेस को 48 सीटें मिली।
21 मई 1968 को बंसीलाल हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। वर्ष 1972 में फिर कांग्रेस को प्रचंड बहुमत मिला। लेकिन आपातकाल व बंसीलाल को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद केंद्र में मंत्री बनाने पर 1977 में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया।
जब कांग्रेस को मिलीं महज तीन सीटें
जनता पार्टी ने इस चुनाव में 90 में से 75 सीटों पर विजय पताका फहराई तो कांग्रेस को मात्र तीन सीटें ही मिल सकी। वर्ष 1982 का चुनाव कांग्रेस ने भजनलाल के नेतृत्व में लड़ा इस चुनाव में कांग्रेस को 36 सीटें मिली और निर्दलीयों के दम पर भजनलाल मुख्यमंत्री बने।
चौधरी देवीलाल के न्याय युद्ध के चलते प्रदेश की जनता सरकार को बदलने के संकेत दे रही थी तो भजनलाल को केंद्र सरकार में कृषि मंत्री बनाकर बंसीलाल को मुख्यमंत्री का पद फिर से सौंपा गया। लेकिन वर्ष 1987 में पक्ष में हवा नहीं चलने पर कांग्रेस को मात्र पांच सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। इस चुनाव में लोकदल-भाजपा गठबंधन को 85 सीटें मिलीं।
आपातकाल के बाद यह कांग्रेस की दूसरी बड़ी हार दर्ज हुई। वर्ष 1991 में लोकदल सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा और 1991 का मध्यावधि चुनाव कांग्रेस ने चौधरी वीरेंद्र सिंह डूमरखां के नेतृत्व में लड़ा और इस चुनाव में कांग्रेस ने 51 सीटें हासिल कर सरकार बनाई।
इस चुनाव में बंसीलाल ने अपनी हरियाणा विकास पार्टी बना ली थी। वर्ष 1991 में ही विधायक भजनलाल के पक्ष में आ गए और उन्हें मुख्यमंत्री चुन लिया गया। यह सरकार पूरे पांच साल चली।
'हरियाणा में कमजोर पड़ गई है कांग्रेस'
वर्ष 1996 में बंसीलाल की हविपा एक बड़ी ताकत के रूप में उभरी और कांग्रेस के हिस्से में मात्र नौ विधायक ही आए। हरियाणा में तीसरी बार गैर कांग्रेसी सरकार बनी और बंसीलाल मुख्यमंत्री बने।
वर्ष 2000 के चुनाव में कांग्रेस को मात्र 21 सीटों पर संतोष करना पड़ा और यह पहला अवसर था जब कांग्रेस को लगातार दूसरी बार सरकार बनाने से वंचित होना पड़ा। वर्ष 2005 से भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार अब तक चली आ रही है। हालांकि 2005 के चुनाव के बाद भजनलाल ने कांग्रेस से अलग होकर राजनीतिक दल बना लिया।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बीच कांग्रेस को मात्र एक सीट मिलने से इस बार का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए कड़ी चुनौती बनकर आया है। मोदी लहर, पार्टी के भीतर कांग्रेस के बड़े नेताओं के पार्टी छोड़ने, एंटी इंकमबेंसी फैक्टर से कांग्रेस परेशान है। ऐसे में कांग्रेस का पूरा ध्यान जिताऊ उम्मीदवारों को मैदान में उतारने पर टिका है।
राजनीतिक विश्लेषक अभय दुबे का मानना है कि इस बार हरियाणा में कांग्रेस कमजोर दिख रही है। कांग्रेस के खिलाफ अगर अन्य प्रमुख दलों में कोई गठबंधन होता है या मोर्चा बनता है, जिसकी संभावना अब कम ही है तो कांग्रेस को ज्यादा नुकसान होगा।
इस चुनाव में आईएनएलडी राइज कर सकती है। लेकिन सही तस्वीर हमारा हरियाणा में सर्वे पूरा होने पर ही सामने आएगी। यह बात सही है कि अब तक का इतिहास देखें तो हरियाणा में कांग्रेस के पक्ष में या तो मेंडेट आता है या उसकी हालत खराब होती है।