दिल्ली: कई मसलों पर था एलजी और सीएम में टकराव, 2015 से हुई थी ऐसे शुरुआत
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दिल्ली सरकार व उपराज्यपाल के बीच टकराव की बुनियाद 2015 में ही पड़ गई थी। सत्ता हासिल करने के तीन महीने बाद मई 2015 में दिल्ली सरकार ने आरोप लगाया कि भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के डर से एसीबी को उपराज्यपाल के अधीन कर दिया गया है, जबकि पूर्व की शीला दीक्षित सरकार में एसीबी दिल्ली सरकार के अधीन थी। दिल्ली सरकार का आरोप था कि इसके लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति शासन के दौरान 2014 में बाकायदा नोटीफिकेशन भी जारी किया था।
नियुक्ति व तबादले के मामले में टकराव बतौर कार्यवाहक मुख्य सचिव एस. गैमलिन की नियुक्ति से शुरू हुआ। उपराज्यपाल ने वरिष्ठ अधिकारी गैमलिन को मुख्य सचिव नियुक्त किया, जबकि अरविंद केजरीवाल ने इसका विरोध किया। विवाद इस कदर गहराया कि सरकार ने सेवा विभाग के सचिव ए. मजूमदार के दिल्ली सचिवालय स्थित कार्यालय पर ताला लगा दिया। मजूमदार ने ही गैमलिन की नियुक्ति का आदेश जारी किया था।
इसके बाद केजरीवाल लगातार उपराज्यपाल पर हमलावर रहे। उन्होंने यहां तक शिकायत की कि मुख्यमंत्री को अपने कार्यालय में तैनात चपरासी तक के तबादले का अधिकार नहीं है। साथ ही आरोप लगाया कि नौकरशाह सरकार के आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं। आरोप-प्रत्यारोप के बीच दिसंबर 2015 में सरकार के दो विशेष सचिव के निलंबन के आदेश के खिलाफ अधिकारी एक दिन के अवकाश पर चले गए।
सीसीटीवी कैमरे लगाने के प्रस्ताव पर भी विवाद खड़ा हो गया
इसके बाद सीसीटीवी कैमरे लगाने के दिल्ली सरकार के प्रस्ताव पर भी मई में विवाद खड़ा हो गया। उपराज्यपाल ने जरूरी बदलाव की सिफारिश करते हुए प्रस्ताव दिल्ली सरकार को लौटा दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री समेत सभी मंत्रियों ने उपराज्यपाल कार्यालय के बाहर करीब तीन घंटे तक धरना दिया। इससे पहले फरवरी में मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ मुख्यमंत्री आवास में मध्य रात्रि को हुई कथित मारपीट के मामले में अधिकारी व सरकार आमने-सामने आए। अधिकारियों ने मंत्रियों की बैठकों में जाने से इनकार कर दिया।
अधिकारियों की हड़ताल की बात कहते हुए मुख्यमंत्री ने बीते दिनों अपने मंत्रियों के साथ 9 दिन तक राजनिवास में धरना दिया। पार्टी ने दिल्ली में रैली भी निकाली। मुख्यमंत्री की मांग थी कि उपराज्यपाल हड़ताल खत्म कराने के साथ डोर स्टेप डिलीवरी योजना को मंजूर करें। इस बीच, उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया व मंत्री सत्येंद्र जैन ने अनशन भी किया। दोनों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अरविंद केजरीवाल ने उस वक्त आरोप लगाया था कि उपराज्यपाल का व्यवहार वायसराय की तरह है। उन्हें वह मुख्यमंत्री से मुलाकात करने तक का वक्त नहीं मिला।
कब क्या हुआ
दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच टकराव, कब क्या हुआ
जून 2015 : दिल्ली सरकार ने बतौर एसीबी प्रमुख एमके मीना की नियुक्ति की वैधता को हाईकोर्ट में किया चेलेंज
अप्रैल 2016 : आप सरकार ने हाईकोर्ट में उपराज्यपाल के अधिकार को चुनौती देने वाली याचिका को बड़ी बेंच में ट्रांसफर करने की अपील की।
अगस्त 2016 : हाईकोर्ट ने दिया आदेश, उपराज्यपाल दिल्ली को प्रशासनिक प्रमुख, कैबिनेट का फैसला मानने को बाध्य नहीं।
सितंबर 2016 : सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर दिल्ली सरकार की तरफ से हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर 6 याचिकाओं पर मांगा जवाब।
फरवरी 2017 : सुप्रीम कोर्ट ने मामले को संवैधानिक बेंच को भेजा।
दिसंबर 2017 : सुप्रीम कोर्ट ने फैसला रिजर्व किया।
जुलाई 2018 : सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि उपराज्यपाल के पास फैसले लेने का स्वतंत्र अधिकार नहीं। वह सरकार की सलाह मानने को बाध्य।