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यहां की आबोहवा भी जहरीली, कहीं मास्क ना बन जाए मजबूरी

Sat, 12 Dec 2015 04:02 PM IST
Updated Sat, 12 Dec 2015 04:02 PM IST
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Climate is poisoned, somewhere it will become a compulsion of masks

साइबर सिटी में बढ़ते प्रदूषण के बीच कहीं मास्क लगाना मजबूरी न बन जाए। बृहस्पतिवार को किंगडम ऑफ ड्रीम्स में घूमने आए कैंसर पीड़ित मासूम बच्चों के चेहरे पर लगे मास्क को देखकर कम से कम यही नतीजा निकल रहा है। अधिकांश बच्चे चेहरे पर रंग-बिरंगे मास्क लगाए हुए थे।

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बता दें कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने बढ़ते प्रदूषण पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि मेरा पोता प्रदूषण के कारण मास्क लगाकर स्कूल जाता है।

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प्रदूषण के खतरे को भांपते हुए लोग अब इसका इस्तेमाल ज्यादा करने लगे हैं। आमतौर पर पहले विदेशी गुड़गांव में मास्क लगाकर घूमते थे, लेकिन अब स्थानीय लोग भी इसे लगा रहे हैं।
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पार्टिक्यूलेट मैटर 2.5 व 10 के साथ बढ़ रही जहरीली गैसें

Climate is poisoned, somewhere it will become a compulsion of masks

दरअसल, साइबर सिटी की आबोहवा में पार्टिक्यूलेट मैटर (पीएम) 2.5 व 10 के साथ नाइट्रोजन डाइऑक्साइड व कार्बन मोनोऑक्साइड की मात्रा बहुत तेजी से बढ़ रही है।


डीजल व अन्य वाहनों से निकलने वाले धुएं में यह प्रमुख तत्व होता है। यह शरीर के अंदर प्रवेश कर जाता है फिर स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है। हवा में मौजूद नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की बनी मोटी परत के कारण बच्चा बीमार हो सकता है।

बाल चिकित्सक और पर्यावरण विशेषज्ञ दोनों ही पिछले आठ सालों से हवा में उपस्थित नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के बढ़ने के कारण बहुत चिंतित हैं।

प्रदूषण के प्रभाव को ऐसे करें कम

Climate is poisoned, somewhere it will become a compulsion of masks

कोलंबिया अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. हिमांशु बत्रा कहते हैं नाइट्रोजन डाइऑक्साइड से फेफड़े और श्वास संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो रही है। बच्चों में यह श्वास संबंधी समस्या एक स्थायी समय तक रह सकती है।


आंखों में जलन और त्वचा संबंधी समस्या आम हो गई है। मेदांता अस्पताल के न्यूरोलॉजी विभाग के सहायक निदेशक डॉ. विपुल गुप्ता कहते हैं कि बच्चा जब बढ़ने की अवस्था में होता है तो इसका कुप्रभाव बच्चे पर बहुत बुरी तरह पड़ता है। प्रदूषण के कारण न्यूरोलॉजिकल क्षति, चिड़चिड़ापन और मानसिक सतर्कता का शिकार हो सकता है।

प्रदूषण के प्रभाव को ऐसे करें कम
•आसपास की जगह पर वायु प्रदूषण का स्तर चेक करें
•अगर स्मॉग अधिक है तो बच्चों को आउटडोर खेल खेलने से रोकें
•बच्चे को अधिक से अधिक तरल पदार्थ खिलाएं
•अपने बच्चे की सेहत का ध्यान रखें
•यदि उसे अस्थमा या एलर्जी है तो उस पर नजर रखें
•डॉक्टर से पहले ही सलाह-मशविरा कर लें

कहां से आबोहवा में आ रही है नाइट्रोजन

Climate is poisoned, somewhere it will become a compulsion of masks

डीजल व अन्य ईंधन के जलने से नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सीएनजी वाहनों में नाइट्रोजन नहीं होता। लेकिन यह इन वाहनों में प्रज्वलन का कारण होता है जो हवा में मौजूद ऑक्सीजन को नाइट्रोजन में बदल देता है।

ऑटोमोबाइल एक्सपर्ट राजन मित्तल कहते हैं एक डीजल वाली कार में तीन पेट्रोल वाली कारों के बराबर नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का स्तर होता है। एसयूवी व अन्य डीजल गाड़ियों में पेट्रोल वाहनों के मानदंड की तुलना में तीन गुणा प्रसारित होती है।

आमतौर पर माना जाता है कि मास्क से प्रदूषण के तत्व फेफड़े तक नहीं पहुंच पाता है। हालांकि डॉक्टर इसे पूरी तरह कारगर नहीं मानते। बाजार में इन दिनों में मास्क की मांग के साथ उपलब्धता बढ़ गई है।

मेडिकल स्टोर पर साधारण मास्क से लेकर ट्रिपल लेयर मास्क बिक रहे हैं। दुकानदारों की मानें तो बाजार में अचानक मांग बढ़ गई है। केमिस्ट एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि अलग-अलग इलाके से आई मांग में 15-20 फीसदी इजाफा हुआ है। गुलाबी, सफेद, हरा, ब्ल्यू और रंगीन मास्क भी आ रहे हैं।

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