साइबर सिटी की न्यू रेलवे रोड के भीम नगर मोड़ से अंदर संकरी गलियों से गुजरते हुए करीब पांच सौ मीटर चलने पर एक छोटा सा मंदिर मिलता है। यह मंदिर कौरवों और पांडवों को धनुष विद्या सिखाने वाले गुरु द्रोणाचार्य का है।
अब तक किसी भी सरकार ने इस मंदिर की सुध नहीं ली
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गुरूग्राम
- फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, गुड़गांव
राज्य सरकार ने विश्व प्रसिद्ध गुड़गांव का नाम बदलकर इनके नाम पर गुरुग्राम तो कर दिया, लेकिन इसके और द्रोणाचार्य तालाब के जीर्णोद्धार की कोई बात नहीं कही। इससे पहले भी कभी किसी सरकार ने द्रोणाचार्य और एकलव्य के मंदिर की सुध नहीं ली। यहां न गुरु की कोई बड़ी प्रतिमा है, न बोर्ड और न गेट। यह मंदिर वर्षों से उपेक्षा का शिकार है।
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गुरूग्राम
- फोटो : ब्यूरो/अमर उजाला, गुड़गांव
एक तरफ साइबर सिटी का दिल्ली से लेकर अरावली की वादियों तक में फैलाव होता रहा तो दूसरी ओर इसकी सांस्कृतिक पहचान कब्जों और आवासों के बीच में दम तोड़ती रही।
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गुड़गांव
- फोटो : अमर उजाला
द्रोणाचार्य का प्राचीन मंदिर कभी खुले में हुआ करता था, लेकिन अब वह घरों के बीच कैद होकर रह गया है। मंदिर के सामने जो तालाब हुआ करता था, उसमें इतनी गंदगी है कि आप कल्पना नहीं कर सकते। सरकार ने इस शहर से हजारों करोड़ रुपये टैक्स के रूप में लिए, लेकिन इस सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने लाने के लिए कोई कोशिश तक नहीं की।
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गुरुग्राम, एकलव्य मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
मंदिर में सेवा से जुड़े कलीराम शर्मा का कहना है कि गुड़गांव गांव के एक व्यक्ति ने 1721 में गुरु द्रोणाचार्य की कर्मस्थली पर उनके मंदिर का निर्माण करवाया था, तब से अब तक किसी भी सरकार ने इस मंदिर की सुध नहीं ली। पिछले 20-25 साल में गुड़गांव ने काफी तरक्की की।