बिना मानक में बदलाव पानी कैसे बचाएंगे नए पावर प्लांट, जल उपभोग सीमा को लेकर नई गाइडलाइन जारी
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एक जनवरी 2017 के बाद लगाए गए सुपर क्रिटिकल पावर प्लांट के जल उपभोग सीमा को लेकर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने संशोधित गाइडलाइन जारी की है। जल उपभोग के नए प्रावधान पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। गाइडलाइन के मुताबिक नए सुपर क्रिटिकल पावर प्लांट 3 घन मीटर प्रति मेगावाट प्रति घंटा जल उपभोग कर सकते हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि नई तकनीकी वाले पावर प्लांट के लिए जल उपभोग की यह नई सीमा काफी ज्यादा है। इससे पावर प्लांट के जरिए होने वाले जल उपभोग को कम करने में मदद नहीं मिलेगी। वहीं वैश्विक स्तर पर भी जल उपभोग की यह सीमा काफी ज्यादा है।
पर्यावरणीय कानूनों और नियमों के जानकार ऋत्विक दत्ता का कहना है कि नई गाइड लाइन में दिए गए सुझावों और आपत्तियों को केंद्रीय मंत्रालय ने न सिर्फ नजरअंदाज कर दिया है बल्कि नई जल उपभोग सीमा का कोई वैज्ञानिक आधार भी नहीं है। वहीं, सभी पावर प्लांट को जीरो डिस्चार्ज के लिए भी कहा गया है। यह देखा गया है कि ज्यादातर पावर प्लांट पानी की बर्बादी को रोक नहीं रहे हैं।
सीईए की रिपोर्ट के विपरीत है नई जल उपभोग सीमा
ऋत्विक दत्ता ने बताया कि 2012 में केंद्रीय बिजली प्राधिकरण (सीईए) ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जो पावर प्लांट पुरानी तकनीकी (सब-क्रिटिकल बॉयलर) पर काम कर रहे हैं उन्हें ही अधिकतम 3 घन मीटर प्रति मेगावाट घंटा जल उपभोग की इजाजत होगी। जबकि नए प्रावधान में नई तकनीकी पर आधारित पावर प्लांट के जल उपभोग की सीमा को भी समान ही रखा गया है। ऐसे में जल उपभोग की सीमा घटाने का लक्ष्य पूरा करने मुश्किल दिख रहा है।
सब क्रिटिकल बॉयलर में होती है पानी की ज्यादा खपत
सब-क्रिटिकल बॉयलर ज्यादा पानी की मांग करते हैं जबकि सुपर क्रिटिकल इंजन पानी की खपत कम करते है। नई गाइडलाइन में सुपर क्रिटिकल इंजन की तकनीकी को देखते हुए जल उपभोग की सीमा घटाने की मांग हो रही थी।
चीन और दक्षिण अफ्रीका के पुराने पावर प्लांट बेहतर
लीगल इनिशिएटिव फॉर फारेस्ट एंड एनवायरमेंट (लाइफ) की गीतांजलि श्रीधर ने बताया कि वैश्विक स्तर पर चीन और दक्षिणी अफ्रीका के पुराने तकनीकी वाले सब-क्रिटिकल पावर
प्लांट जल उपभोग के मामले में भारत के सुपर क्रिटिकल पावर प्लांट से बेहतर हैं। चीन में सब-क्रिटिकल 600 मेगावाट प्लांट में वेट कूलिंग टावर सिर्फ 1.96 घन मीटर प्रति मेगावाट घंटा जल उपभोग करते हैं। वहीं, दक्षिण अफ्रीका में पावर प्लांट के जल उपभोग की सीमा 2.32 घन मीटर प्रति मेगावाट घंटा है।
थोड़ी कटौती से पूरी हो सकती है 44 हजार लोगों के लिए जलापूर्ति
यदि 500 मेगावाट क्षमता वाले पावर प्लांट में जल उपभोग की सीमा 0.5 घन मीटर प्रति मेगावाट घंटा भी बढ़ाया जाता है तो इसका मतलब है कि संबंधित मेगावाट 21,90,000 घन मीटर पानी पूरे वर्ष में ज्यादा इस्तेमाल करेगा। पूरे वर्ष एक वक्ति पर औसत घरेलू जल खपत 49.275 घन मीटर होता है। ऐसे में आप इतने पानी से 44 हजार लोगों के पानी की जरूरत को पूरा कर सकते हैं। भारत में वैसे ही जलसंकट गहराने लगा है।
दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण भी बढ़ा रहे पावर प्लांट
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि दिल्ली-एनसीआर के 300 किलोमीटर की परिधि में मौजूद सभी पावर प्लांट पुराने तकनीकी और
मानकों पर काम कर रहे हैं। इनके उत्सर्जन की वजह से यहां प्रदूषण की समस्या बनी हुई है। वहीं, रिपोर्ट से अलग विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली-एनसीआर के कई इलाके भी जल-संकट की मार झेल रहे हैं।
समुद्री जल के इस्तेमाल की कोई सीमा नहीं
ऐसे थर्मल पावर प्लांट जो समुद्री जल का इस्तेमाल करते हैं उनके लिए न तो कोई जल उपभोग की सीमा है और न ही डिस्चार्ज के लिए कोई अनिवार्य नियम। इससे भी समुद्र में रहने वाले जलीय जीवों और वनस्पतियों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।