RTI को नजरअंदाज करना सोनिया पर पड़ा भारी!
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दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ शिकायत पर छह महीने के भीतर फैसला करने का निर्देश दिया है।
सोनिया गांधी के खिलाफ यह शिकायत केंद्रीय सूचना आयोग के उस निर्देश का पालन नहीं करने के मुद्दे पर है जिसमें कहा गया था कि पार्टी सूचना के अधिकार कानून के तहत जवाबदेह है।
न्यायमूर्ति विभू बाखरू ने यह निर्देश आरटीआई कार्यकर्ता आरके जैन की याचिका का निपटारा करते हुए दिया। जैन ने सोनिया के खिलाफ अपनी शिकायत के साथ आयोग का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें कहा गया था कि पार्टी ने उनका 7 फरवरी 2014 को आरटीआई आवेदन बिना जवाब के लौटा दिया था।
आयोग की पूर्ण पीठ ने कांग्रेस और पांच अन्य राष्ट्रीय दलों भाजपा, भाकपा, माकपा, राकांपा और बसपा को पब्लिक अथॉरिटी घोषित करते हुए उन्हें आरटीआई अधिनियम के तहत जवाबदेह बनाया था।
कांग्रेस के इस काम ने बढ़ाई है उसकी मुश्किल
आरटीआई अधिनियम के तहत सूचना प्रदान करने से इंकार करना या पूरी सूचना नहीं देने को अपराध माना गया है और उसके लिए उस दिन से प्रतिदिन 250 रपये के जुर्माने का प्रावधान है जिस दिन से सूचना देना जरूरी हो जाता है और जिस दिन पब्लिक अथॉरिटी के लोक सूचना अधिकारी ने सूचना दी।
किसी भी राजनैतिक दल ने अब तक आयोग के इस फैसले के खिलाफ स्थगनादेश हासिल नहीं किया है जिसमें इन पार्टियों को पब्लिक अथॉरिटी घोषित किया गया है। इसका आशय है कि उन्हें आरटीआई कानून के तहत आरटीआई आवेदनों पर विचार की प्रक्रिया को अवश्य अपनाना चाहिए।
लेकिन जब जैन ने कांग्रेस पार्टी के पास आरटीआई अधिनियम को लागू करने के लिए पार्टी की ओर से उठाए गए कदमों पर जानकारी मांगी तो पार्टी ने आवेदन लेने से इंकार कर दिया और लिफाफे को लौटा दिया।
जैन ने आरोप लगाया, प्रतिवादियों ने आरटीआई अधिनियम के तहत आदेश और सीआईसी के 3 जून 2013 के आदेश के बावजूद जानबूझकर, दुर्भावनापूर्ण तरीके से और लगातार सूचना प्रदान नहीं की।
जैन ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया क्योंकि आयोग ने तत्कालीन मुख्य सूचना आयुक्त सुषमा सिंह के समक्ष बार-बार अर्जी दिए जाने के बावजूद उनकी शिकायत नहीं दर्ज की।