संसद में कैग रिपोर्ट से खुली सरकार की पोल
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केंद्र सरकार ने बेशक दिल्ली में यमुना नदी की सफाई पर गंभीर है। लेकिन दिल्ली सरकार के पास अभी तक नदी में गिरने वाले सीवेज की मात्रा ही नहीं पता है। इतना ही नहीं, साल दर साल यमुना खादर में आ रहे बदलावों का भी दस साल से आंकलन नहीं हुआ है।
इसका खुलासा नियंत्रक महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में हुआ है। दिल्ली सरकार की 96 एजेंसियों की लेखा परीक्षा से जुड़ी रिपोर्ट शुक्रवार को संसद में पेश की गई।
वित्तीय वर्ष 2012-2013 पर तैयार रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि अनधिकृत कॉलोनियों समेत दिल्ली की 46 फीसदी आबादी का सीवेज मानसूनी नालों से गुजरता है।
इस मामले में भी फेल हुई एजेंसी
संबंधित एजेंसी अभी तक सीवेज फ्लो से नालों पर पड़ने वाले असर का आंकलन नहीं कर सकी है। वहीं, सिंचाई व बाढ़ नियंत्रण विभाग ने 2004 से यमुना नदी का सर्वे नहीं किया है।
इससे यमुना खादर में हो रहे सालाना बदलाव का आंकलन मुमकिन नहीं है। 2008-10 के बीच नदी में बाढ़ आई थी। फिर भी विभाग ने 2011 तक किसी नए निर्माण का प्रस्ताव नहीं किया।
इसके अलावा रिपोर्ट बताती है कि नालों की सफाई व कचरे के सही स्थान पर निपटान का भी विभाग ने बंदोबस्त नहीं किया। मानसून आने पहले न तो नालों की सफाई की गई न ही मरम्मत कार्य ही पूरा किया जा सका था।
2 हजार करोड़ से ज्यादा का नुकसान
शहर में जल जमाव वाली जगहों की पहचान के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। लिहाजा बार-बार कुछ निश्चित स्थानों पर होने वाले जल जमाव की समस्या दूर नहीं हुई।
इसके अलावा सीएजी को वित्त व वाणिज्य मंत्रालय से जुड़े विभागों में ढेरों खामियां मिली है। रिपोर्ट बताती है कि सरकार को व्यापार एवं कर, उत्पाद शुल्क, परिवहन, मनोरंजन, विलासिता कर से जुड़े 2238 मामलों में या तो कम आकलन किया या शुल्क कम लगाकर शुल्क भी कम वसूला।
इससे सरकार को कुल 2041.32 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।
सरकार के पास नहीं है भरोसेमंद रिकॉर्ड
रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड ने न तो आश्रय सलाहकारी समिति और बस्ती विकास समिति का गठन किया और न ही झुग्गी बस्ती के स्थान पर कोई नयी आवासीय योजना ही ला सकी है।
इतना ही नहीं, बोर्ड के पास अपनी संपत्तियों का कोई भरोसेमंद रिकार्ड है। इसके अलावा बोर्ड को आवंटियों से 232.10 करोड़ रुपये की रिकवरी भी करनी है।
रिपोर्ट बताती है कि अमूमन पानी व सीवेज लाइन डलने के बाद ही नई सड़क बनाई जाती है। लेकिन डीएसआईआईडीसी ने 206 करोड़ की सीमेंट की सड़क बनाते समय इसका ख्याल ही नहीं किया। ऐसा कई इलाकों में हुआ। वहीं, विभिन्न प्रोजेक्ट में कंसल्टेंट की नियुक्ति में भी ढेरों अनियमितताएं मिलीं है।
3029 करोड़ खर्च के बाद भी विकास नहीं
2012-13 में दिल्ली सरकार ने कॉलोनियों को अधिकृत करने की लंबी-चौड़ी घोषणाएं की। लेकिन इनके विकास कार्यों की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
3029.21 करोड़ रुपये खर्च के बाद भी सरकार 895 अनधिकृत कॉलोनियों में सीवर, पानी, ड्रेनेज सिस्टम के साथ सड़क आदि का 2013 तक निर्माण नहीं कर सकी। इतना ही नहीं, प्रोविजनल सर्टीफिकेट नियमों के अनुसार नहीं दिए गए।
अस्पतालों ने दिल्ली जल बोर्ड को सात करोड़ रुपये से ज्यादा अतिरिक्त बिल का भुगतान किया। रिपोर्ट बताती है कि एक तरफ वाटर हारवेस्टिंग सिस्टम व वाटर ट्रीटमेंट प्लांट पर अस्पतालों में 2.61 करोड़ रुपये का खर्च हुआ। इसकी एवज में पानी के बिल में से पंद्रह फीसदी की छूट मिलनी चाहिए थी। लेकिन अस्पताल ने 7.28 करोड़ की मिली छूट का भुगतान कर दिया।
डीटीसी को 53.59 करोड़ की चपत
डीटीटीडीसी में 5.67 करोड़ रुपये का फंड ऑपरेटर के चयन के लिए सलाहकार नियुक्त न कर पाने की वजह से ब्लॉक हो गया। दिल्ली विधानसभा की कैंटीन से निगम को 1.44 करोड़ का नुकसान हुआ। वहीं, डीटीसी की दो स्टाफ कॉलोनियों में अवैध कब्जे से 53.59 करोड़ रुपये की चपत लगी।
सीएजी को तकनीकी संस्थानों में मानवीय व भौतिक संसाधनों की भी कमी मिली। आईआईटी के लिए 1142 तय पदों में से 292 खाली थे।
जबकि पॉलीटेक्निक संस्थानों के 1080 पदों में 309 खाली थे। नौ में से आठ प्रिंसिपल के पद और 25 में से 21 डिपार्टमेंट हेड के पद खाली थे। इतना ही नहीं, आईआईटी स्कूलों में उपकरणों की भी कमी रही।
समुदाय भवनों में नागरिक सुविधाओं का टोटा
सीएजी को समुदाय भवनों के रखरखाव में एमसीडी की लापरवाही हैरान करने वाली दिखी। अमूमन सार्वजनिक कार्यक्रमों के लिए इस्तेमाल होने वाले इस स्थलों पर नागरिक सुविधाओं का टोटा था।
यहां न तो पेयजल, ड्रेनेज, सीवेज का इंतजाम था। न ही साफ-सफाई व बिजली की सुविधा मुहैया कराने में एमसीडी सफल हो सकी है। इसके अलावा पार्किंग सुविधा व अग्नि सुरक्षा का इंतजाम भी यहां पर्याप्त नहीं है।
इसके अलावा दिल्ली सरकार के विभागों में कर्मचारियों की नियुक्ति के जिम्मेदार एसएसएसबी में भी सीएजी को खामियां मिलीं। बोर्ड बड़ी संख्या में नियुक्तियां नहीं कर सका है। इससे जरूरत होने के बावजूद कई विभागों में कर्मचारियों का टोटा है। फिर, आवेदन लेने के 180 दिन के भीतर नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने के मामले में भी बोर्ड नाकाम रहा है।