72 वर्ष में तीसरी बार विस्थापन का दंश झेलने को विवश सैकड़ों कारोबारी
विभाजन के बाद पाकिस्तान के पेशावर से दिल्ली का रुख करने वाले 74 वर्षीय सोहन सिंह ने महज दो रुपये में भी अपने परिवार के साथ गुजर बसर किया। मोतिया खान के बाद उन्हें मायापुरी स्क्रैप कारोबार के लिए जगह मिली। पिछली चार पीढिय़ों से इसी काम में जुटे परिवार इस बार के विस्थापन के दर्द से इस कदर सदमे में हैं कि उनके जेहन में बस यही सवाल है कि ....अब जाएं तो जाएं कहां।
कबाड़ बेचकर अपना जीवन यापन करने वाले दुकानदारों पर शनिवार को सीलिंग की गाज गिरी। इनमें सोहन सिंह सरीखे सैकड़ों परिवारों को सीलिंग के कारण विस्थापन का दंश झेलने को मजबूर हैं।
मायापुरी में बसे अधिकतर कारोबारी पाकिस्तान से विस्थापित हैं। 72 वर्षों में तीसरी बार उन्हें विस्थापित होना पड़ रहा है। लेकिन इस बार न तो उन्हें कोई जगह मिल रही है और जीने का कोई जरिया नजर आ रहा है। एक कारोबारी ने तो यह भी कह दिया कि हालात से इतना ऊब चुके हैं कि उनके पास आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। न तो पढ़ाई की जो कोई नौकरी कर लें, अब बच्चों के लिए कुछ करने का वक्त आया तो उनसे कारोबार छिन रहा है। इंडस्ट्रियल एरिया की इकाईयों में काम करने वाले हजारों कामगारों पर भी सीलिंग की मार पड़ी है।
दलजीत सिंह का कहना है कि इस कार्रवाई के बाद अब उनके पास काम करने के लिए न तो जगह बची और न ही कोई जरिया। गुरविंदर सिंह का कहना है कि अचानक उन्हें दुकानें खाली करने के लिए नोटिस भेज दिया गया। कुछ घंटों का वक्त होने की वजह से वाहनों में अपनी दुकान का सामान लोड कर बिक्री के लिए भेज रहे हैं। संतोख सिंह का कहना है कि पिछले 35 वर्ष से ऑटो स्पेयर पाट्र्स बेचने का काम कर रहे हैं। 1975 में 25 गज की दुकान मिलने के बाद मेहनत कर परिवार का गुजर बसर कर रहे थे।
लेकिन सीलिंग की इस बार होने वाली कार्रवाई ने उन्हें सड़कों पर खड़ा कर दिया है। अब न तो काम करने की जगह है और न ही कर्मी होंगे, फिर कैसे गुजारा करेंगे, इसी चिंता में डूबे संतोख सिंह भी रविवार को दुकान को खाली करने में जुटे रहे। दलजीत ङ्क्षसह ने कहा कि इस तरह की कार्रवाई हिटलरशाही है। कबाड़ बन चुकी कारें यहां आती हैँ, जिनके पाट्र्स अलग अलग बेच दिए जाते हैं। इससे होने वाला प्रदूषण क्या इतना अधिक है कि उनके कारोबार बंद करने के लिए सीलिंग की कार्रवाई की जा रही है। बार -बार जगह बदले जाने से मुश्किलें इतनी बढ़ गई हैं कि इस बार अधिकतर कारोबारियों को संभलने का कोई रास्ता भी नजर नहीं आ रहा है।
सीलिंग से सैकड़ों परिवारों के लिए उठ गए कई सवाल
मायापुरी इंडस्ट्रियल एरिया में दुकानों में दिल्ली के अलग अलग इलाकों से गाडिय़ां पहुंचती हैं। दुकानदारों का कहना है कि इन वाहनों के दस्तावेज देखने के बाद अलग अलग हिस्सों में कर, इनके पाट्र्स आगे बेच दिए जाते हैं। फिर इन्हें दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाया जाता है। दुकानदारों की दलील है कि अगर प्रदूषण के मानकों की अनदेखी हो रही है तो इसके लिए उपाय लागू करने के आदेश देने की बजाय सीलिंग की कार्रवाई से सैकड़ों परिवारों के लिए कई सवाल खड़े होने लगे हैं।