इन पांच बड़ी गलतियों से बीजेपी को लेना चाहिए सबक
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2015 में दिल्ली के सियासी चक्रव्यूह में फंस चुकी भारतीय जनता पार्टी जहां 2014 में सत्ता शीर्ष पर पहुंची थी वहीं दूसरी ओर इस राष्ट्रीय पार्टी ने चुनावी कैम्पेन के दौरान लगातार ऐसी गलतियां की जो पार्टी के भविष्य के लिए खतरा बन सकती हैं।
राज्यों में लगातार जीत के रथ पर सवार बीजेपी ने वही सारी पुरानी गलतियां राजधानी के चुनावों में भी दोहरा दीं। यही वजह रही कि दिल्ली में बीजेपी के जीत का रथ रुकने के आसार दिखाई दे रहे हैं।
बीजेपी को ये देखना चाहिए था कि क्या मोदी के अलावा भी उसके पास कोई ऐसा शस्त्र है जो उसे लगातार चुनावी मुहिम में मजबूती दे सकता है। जानिए कौन सी हैं वो पांच गलतियां जो बन गईं बीजेपी के लिए मुसीबत।
आखिरी वक्त में हुआ गलती का एहसास
बीजेपी की पहली गलती ये है कि उसे आखिरी वक्त में दिल्ली में अपनी गलती का एहसास हुआ कि हर चुनाव सिर्फ और सिर्फ मोदी को आगे करके नहीं जीता जा सकता।
दिल्ली में अपनी खराब होती स्थिति की वजह से पार्टी ने आखिकार किरण बेदी को मुख्यमंत्री के रूप में भाजपा का सीएम प्रत्याशी बना दिया। लेकिन किरण बेदी भी बीजेपी के लिए कोई फायदे का सौदा साबित नहीं हुईं।
किरण बेदी के चेहरे ने जरूर लोगों को अपनी ओर खींचा,लेकिन उनके कैम्पेन करने के तरीके और उनके व्यवहार ने बीजेपी के स्थानीय नेताओं में असुरक्षा का माहौल बना दिया जो भाजपा के लिए एक बड़ी परेशानी बन सकती है।
प्रधानमंत्री बन गए महज चुनावी कैम्पेनर
भारतीय जनता पार्टी जिस दूसरी सबसे बड़ी गलती को दोहराती जा रही है वो है प्रधानमंत्री को सिर्फ और सिर्फ चुनावी कैम्पेनर बना देना। देश की जनता चाहती है कि जिस आस के साथ उसने प्रधानमंत्री को चुनकर देश की बागडोर सौंपी है वो उस काम को बेहतर तरीके से निभाएं।
लेकिन वास्तविकता में ऐसा हो नहीं रहा है। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री के रूप में एक बेहतर कार्यप्रशासक की तरह काम करने से ज्यादा राज्यों में भाजपा के लिए जीत की कैम्पेनिंग ही करते दिखाई दे रहे हैं।
ऐसा संभव भी नहीं है कि एक प्रधानमंत्री चुनावी कैम्पेनिंग के साथ-साथ देश के लिए बेहतर कार्ययोजनाओं को लागू कर सके। क्योंकि इसके लिए किसी सुपर मानव की ही कल्पना की जा सकती है, जो कि नरेन्द्र मोदी नहीं है
विपक्षी पर निजी हमलों ने कर दी मुसीबत
बीजेपी की तीसरी सबसे बड़ी गलती है जिसे भारतीय जनता पार्टी को अपनी चुनावी रणनीति में सुधारना चाहिए वो है चुनावो को खुद की निजी लड़ाई बना लेना।
भारतीय जनता पार्टी दिल्ली में लगातार आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल पर निजी हमले करती जा रही थी। जिस फंड के मसले को दिल्ली की राजनीति को उसे पहले आगे लाना चाहिए उसके लिए उसने देर कर दी।
बीजेपी निजी हमलों से ज्यादा विपक्षी पार्टी की गलतियों को निशाना बना सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। दिल्ली की चुनावी रणनीति में उसके ऐसा करने से बीजेपी की एक नकारात्मक छवि सकबे सामने आ गई।
निजी हमलों के लिए बीजेपी ने अरूण जेटली, निर्मला सीतारमण और पियूष गोयल जैसे बड़े नेताओं को उतार दिया है। ये बिल्कुल उस तरह का हो गया है जैसे एक मच्छर को मारने के लिए मिसाइलें दागनी पड़ें।
इस वजह से उठाना पड़ रहा है नुकसान
बीजेपी सकारात्मक राजनीति के जरिए दिल्ली में एक स्वस्थ राजनीतिक स्थिति को पैदा कर सकती थी। केन्द्र सरकार की बेहतर उपलब्धियों को दिल्ली की जनता के साथ तालमेल बिठाकर उससे दिल्ली में स्थिति को मजबूत किया जाना चाहिए था।
बीजेपी मोदी की स्मार्ट सिटी कैम्पेन को दिल्ली में ऐसे कहती कि आप हमें पांच साल दीजिए हम आपको एक वर्ल्ड क्लास सिटी देंगे। इसमें किरण बेदी के विकास के ब्लूप्रिंट को शामिल करने की कोई जरूरत नहीं थी।
पार्टी को अपने विजन डॉक्यूमेन्ट में किरण के उन 37 बिन्दुओं को रणनीति में शामिल ना करके स्वच्छ भारत मिशन और स्मार्ट सिटी जैसे मोदी के नजरिए को बताना चाहिए था। इन्हें भुनाया जा सकता था।
अचानक किरण बेदी को लाना घाटे का सौदा
भाजपा की पांचवी गलती आउटसाइडर को पार्टी में शामिल करके अचानक से मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी बना देना है। पार्टी को चाहिए था कि जिस तरह से भाजपा में नेताओं की पदोन्नति होती है उसी तरह से किसी नेता को यहां सीएम पद का प्रत्याशी बना सकते थे।
किरण को मुख्यमंत्री का प्रत्याशी बनाने से पार्टी के स्थानीय नेताओं में असंतोष ही पैदा नहीं हुआ बल्कि उनके साथ एक बेहतर समन्वय भी स्थापित नहीं हो पाया।
किरण के रणनीतिक रवैये से भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है। क्योंकि उनकी कैम्पेनिंग से भाजपा को फायदा नहीं हुआ बल्कि प्रधानमंत्री को ही कैम्पेन करना पड़ा जिसमें चलो चलें मोदी के साथ नारा ही बुलंद हो सका।