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Ayushman Bharat Scheme: कैंसर मरीजों के इलाज के लिए हर साल 33,000 करोड़ की जरूरत, फिनकैन शोध में खुलासा
Wed, 18 Mar 2026 07:06 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Wed, 18 Mar 2026 07:06 AM IST
सार
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली के डॉ. बीआर अंबेडकर इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर हॉस्पिटल के विशेषज्ञों की फिनकैन शोध में यह बात सामने आई है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : Adobe Stock
विस्तार
आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजेएवाई) देश में कैंसर मरीजों के लिए बड़ी राहत बनकर सामने आई है। इसने लाखों मरीजों को सस्ता और समय पर इलाज दिलाने में मदद की है। लेकिन नई स्टडी के अनुसार, अभी भी इसके बजट और जरूरत के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
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अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली के डॉ. बीआर अंबेडकर इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर हॉस्पिटल के विशेषज्ञों की फिनकैन शोध में यह बात सामने आई है। इसका नेतृत्व डॉ. अभिषेक शंकर ने किया। अध्ययन के अनुसार, 2018 में शुरू हुई योजना के तहत अब तक 68 लाख से ज्यादा कैंसर मरीजों का इलाज हो चुका है, जिस पर 13,000 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं।
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अध्ययन में पाया गया कि कैंसर का पता चलने के 30 दिनों में इलाज शुरू होने की संभावना 90% तक बढ़ गई है। हालांकि, यह भी सामने आया कि कैंसर के मरीजों को बेहतर इलाज देने के लिए हर साल करीब 33,000 करोड़ रुपये की जरूरत है, जबकि अभी सिर्फ करीब 7,700 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा रहे हैं।
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जांच और स्क्रीनिंग सुविधाएं जोड़ने का सुझाव
शोध में सुझाव दिया गया है कि योजना में कुछ बदलाव किए जाएं। हर परिवार के लिए 5 साल में 25 लाख रुपये तक की रिवॉल्विंग लिमिट तय की जाए। इसके अलावा गंभीर मरीजों के लिए 10 लाख रुपये तक की अतिरिक्त मदद का भी सुझाव दिया गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जांच और स्क्रीनिंग सुविधाएं योजना में पूरी तरह शामिल नहीं हैं, जिससे इलाज शुरू होने में देरी होती है। इसलिए इन्हें जोड़ने का सुझाव दिया गया है।
सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम भी उठाए हैं। हाल के बजट में जिला अस्पतालों में 200 नए कैंसर डे-केयर सेंटर खोलने की घोषणा की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, केवल इलाज पर खर्च बढ़ाना ही काफी नहीं है, बल्कि बीमारी की शुरुआती पहचान पर भी ध्यान देना जरूरी है। अगर कैंसर का पता जल्दी चल जाए और इलाज समय पर शुरू हो जाए तो हर साल करीब 1,500 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है और हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है।