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अपने-अपने राम : सत्ता से निर्लिप्त, शांतिप्रिय राम मेरे करीब, मर्यादाओं को पुनर्स्थापित करते हैं पुरुषोत्तम
Sat, 13 Jan 2024 02:30 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sat, 13 Jan 2024 02:30 AM IST
सार
सत्ता की भूख नहीं उनको। तभी जो मिलना था, उसके एकदम विपरीत पाकर भी वह विचलित नहीं हुए। पलक झपकते राजा से वनवासी बनना स्वीकार कर लिया।
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शोभना नारायण
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
सत्ता से निर्लिप्त, शांतिप्रिय राम मेरे सबसे करीब हैं। सत्ता की भूख नहीं उनको। तभी जो मिलना था, उसके एकदम विपरीत पाकर भी वह विचलित नहीं हुए। पलक झपकते राजा से वनवासी बनना स्वीकार कर लिया। सिंहासन पाने का कोई उद्यम, कोई छल-छद्म भी नहीं किया। वन जाकर उसी में रमे भी। संपूर्णता में वनवासी जीवन निभाया। हजारों-हजार, हर तरह के कष्ट सह कर भी। तब पर भी, किसी का उन्होंने बुरा नहीं सोचा।
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राम की शख्सियत के ढेरों आयाम हैं। मुझे सबसे ज्यादा प्रिय यही राम लगते हैं। और क्या मुझे, निजी स्तर पर सभी इससे सीख सकते हैं। बात यह पिता-पुत्र, पति-पत्नी तक के रिश्तों के लिए भी सही है। राम बिखरते शाश्वत मूल्यों और टूटती सामाजिक मर्यादाओं को पुनर्स्थापित करने का भी नाम है। मेरे राम ने किसी को अपशब्द नहीं कहा। ठेस नहीं पहुंचाई। अपमान किसी का नहीं किया। त्तेजित कहीं नहीं हुए। चेहरे पर कभी व्यंग्य का भाव नहीं उभरा। हर तरफ वह नेकी ही बिखेरते रहे। मर्यादा कभी भी, किसी भी हालात में नहीं छोड़ी। अपनी मर्यादा बनाई, निभाई भी।
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चूंकि मैंने राम को तुलसीदास से भी जाना है और वाल्मीकि से भी। तो मुझे लगता है कि राम की शख्सियत बहुत बड़ी इसलिए भी हो सकी कि उनको माता सीता सी पत्नी मिलीं। लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न से भाई मिले। हनुमान सा सेवक मिला। पूर्णता में देखने पर सबकी अहमियत समझ में आती है। मैंने तो आज से चार दशक पहले एक नाटक किया था, कब आओगे राम। इसकी अंतिम लाइनें ही थी कि ‘कैकेयी के कारण राम वन गए, इसीलिए वह राम बन गए।’
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(प्रख्यात कथक नृत्यांगना शोभना नारायण से बातचीत पर आधारित)