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अटाली : बातचीत के बिना गहराई विवादों की खाई

Fri, 10 Jul 2015 06:38 PM IST
मुकेश शर्मा/अमर उजाला, फरीदाबाद
मुकेश शर्मा/अमर उजाला, फरीदाबाद Updated Fri, 10 Jul 2015 06:38 PM IST
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Atali : without conversation, deepens the gap of controversy.

अटाली गांव की गंगा जमुनी संस्कृति इन दिनों खतरे में है। भाईचारे की मिसाल रहा यह आदर्श गांव धार्मिक स्थल के निर्माण पर आमने-सामने है। एक संप्रदाय विशेष के कई लोग तनाव से दुखी होकर गांव छोड़ चुके हैं।

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जबकि दूसरे संप्रदाय के अधिकांश लोगों के मन में कसक है कि कहीं न कहीं गलत हुआ है। इस समय दोनों पक्षों में बातचीत का पुल तैयार करने वाला कोई नहीं है। इसी संवादहीनता के कारण विवाद घटने की जगह बढ़ रहा है।
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पुलिस भी तमाशबीन है, तो सामाजिक संगठन व जनप्रतिनधि विवाद से दूरी बनाए हुए हैं। अपनी फुटबॉल टीम के लिए मशहूर रहा अटाली इस समय धार्मिक स्थल निर्माण विवाद के कारण चर्चा में है।
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नाकाम रहा सरकारी वार्ताओं का नाटक

Atali : without conversation, deepens the gap of controversy.

25 मई को हुई आगजनी और तोड़फोड़ की घटना के बाद एक समय ऐसा भी आया जब गांव के कुछ लोग मामले को सुलझाने की बात कर रहे थे। सरकारी तौर पर कुछ वार्ताओं के नाटक तो हुए लेकिन समाधान नहीं निकला।

एक जुलाई को दोबारा हुए तनाव के बाद दोनों समुदायों के बीच संवाद नहीं हुआ है। सामाजिक कार्यकर्ता डॉ आलोकदीप कहती हैं कि अटाली मामला संवादहीनता के कारण बढ़ रहा है।

गांव में राजनीतिक पृष्ठभूमि के लोगों ने जो बातचीत की, वह समस्या को सुलझाने की नहीं थी बल्कि एक पक्ष के मन में दूसरे के प्रति बैर-भाव को बढ़ाने की थी। हरियाणा स्टेट मुस्लिम वेलफेयर कमेटी के प्रदेश महासचिव मोहम्मद रमजान खान कहते हैं।

'झोली फैलाकर गांव में वापस बुलाया'

Atali : without conversation, deepens the gap of controversy.

संवाद बढ़ाने के लिए संप्रदाय विशेष के लोगों को समझा-बुझाकर राहत शिविर से गांव वापस भिजवाया था। बहुसंख्यक लोग उन्हें झोली फैलाकर ले तो गए लेकिन गांव पहुंचने के बाद संवाद पूरी तरह खत्म कर दिया।

सामाजिक बहिष्कार तक किया। यदि संवाद होता तो दोबारा मामला नहीं भड़कता। अटाली निवासी नूर मोहम्मद ने बताया कि बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों का एक-दूसरे के घर आना जाना था।

लेकिन अब स्थितियां बदल चुकी हैं। दोनों समुदाय के बीच बातचीत पूरी तरह बंद है। यह स्थिति बदलने की जरूरत है। अब सामाजिक संगठन और कार्यकर्ता भी दोनों समुदायों के बीच संवाद का पुल बांधने का काम नहीं कर रहे।

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