1984 सिख दंगा: 34 साल बाद आया फैसला, दो दोषी करार, 20 नवंबर को सजा का एलान
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1984 में सिख विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले में अदालत ने 34 साल बाद बुधवार को दो आरोपियों को हत्या, हत्या की कोशिश, लूटपाट, आगजनी व अन्य धाराओं में दोषी करार दिया। यह पहला मामला है जिसमें एसआईटी की जांच के बाद आरोपी को दोषी ठहराया गया है। पटियाला हाउस अदालत इस मामले में अब 20 नवंबर को सजा सुनाएगी।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अजय पांडे ने नरेश सेहरावत व यशपाल सिंह को महिपालपुर क्षेत्र निवासी हरदेव सिंह व अवतार सिंह की हत्या का दोषी करार दिया है। दोनोें को हिरासत में लेकर तिहाड़ जेल भेज दिया गया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सभी दस्तावेजों व गवाहों के बयानों से स्पष्ट है कि दोनों दोषी उस इलाके में हुए दंगे, लूटपाट व हत्या के मामले में लिप्त थे। इन दोनों ने निर्दोष लोगों के साथ लूटपाट ही नहीं की बल्कि उनके घरों में आग लगाई व निर्दोष लोगों की हत्या कर उनके शव तक जला दिए। हरदेव सिंह के भाई संतोख सिंह की शिकायत पर यह मामला दर्ज किया गया था।
एसआईटी का आरोप था कि नरेश व यशपाल ने महिपालपुर में 1 नवंबर 1984 को दो लोगों की हत्या की थी और तीन लोगों को जख्मी हालत में मृत समझकर छोड़ दिया था। इसके साथ ही कई लोगों के घरों को आग के हवाले कर दिया। एसआईटी ने त्रिलोक सिंह, संगत सिंह व कुलदीप सिंह को गवाह के तौर पर कोर्ट में पेश किया था। इनकी गवाही को भरोसेमंद मानते हुए अदालत ने अपना फैसला सुनाया।
एसआईटी ने दाखिल की थी चार्जशीट
त्रिलोक सिंह अवतार सिंह के भाई हैं और जालंधर में रहते हैं। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सिख दंगों के पांच मामलों की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया था। इन सभी मामलों में चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की 31 अक्तूबर 1984 को हत्या के बाद दंगे भड़क गए थे। इनमें हजारों लोगों की जान गई थी।
एसआईटी ने दाखिल की थी चार्जशीट, पुलिस ने बंद कर दिया था केस
दिल्ली पुलिस ने साक्ष्यों के अभाव में इस मामले की जांच 1994 में बंद कर दी थी। बाद में विशेष जांच दल (एसआईटी) ने मामले की जांच कर चार्जशीट दाखिल की थी। अदालत ने एसआईटी की चार्जशीट में दिए साक्ष्यों व गवाहों से जिरह के आधार पर हत्या, हत्या की कोशिश, लूटपाट, मारपीट, अनाधिकृत प्रवेश व अन्य धाराओं में दोषी ठहराया है। हत्या की धारा में दोषी ठहराये जाने पर मृत्युदंड अथवा आजीवन कारावास का ही प्रावधान है।