ट्रेन से पहले ही छूट गई जिंदगी की गाड़ी, चंद घंटों बाद ही अपनों से मिलने के लिए होने वाले थे रवाना
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
खिलौना, पर्स और लंच बॉक्स बनाने वाली फैक्ट्री के कामगारों के लिए रविवार की सुबह काफी मनहूस थी। गांव जाने के लिए ट्रेनों में टिकट की बुकिंग चंद घंटे बाद की थी, लेकिन पहले रवाना हो गई कई जिंदगियां। 20 कामगार ट्रेनों से दरभंगा और समस्तीपुर के लिए रवाना होने वाले थे।
सोने में रात के वक्त हुई देरी की वजह से अधिकतर कामगारों की नींद नहीं खुली। सुबह आग की लपटों को देखकर नींद खुली तब तक काफी देर चुकी थी। इस दर्दनाक अग्निकांड ने 43 परिवारों की खुशियां चंद मिनटों में छीन लीं।
अनाज मंडी अग्निकांड के मृतकों के गांव और पड़ोस में रहने वालों ने बताया कि फैक्ट्री में फिलहाल काम कम हो गया था। इस वजह से 20 कामगारों ने अपने गांव जाने की तैयारी कर ली थी और इसके लिए ट्रेनों के टिकट भी बुक करवा चुके थे। मौत के इस खौफनाक मंजर से बेफिक्र कामगारों की जिंदगी बच सकती थी कि अगर समय से नींद खुल जाती।
इरफान ने बताया कि ट्रेन में 20 लोगों ने टिकट की बुकिंग करवाई थी, जिनमें छह की वेटिंग लिस्ट में थीं। इस अग्निकांड में अधिकतर की मौत हो गई है, अगर कुछ बचे हैं तो अस्पतालों में उपचाराधीन हैं, जिनके परिजन उनकी तलाश में जुटे हैं।
लपटें देखकर बचीं कुछ जिंदगियां
मो. लाडले ने बताया कि वह फैक्टरी की तीसरी मंजिल पर अपने कमरे में सो रहा थे। सुबह करीब पांच बजे, उनके साथ के ही एक कामगार वॉशरूम से लौटा तो बताया कि हर तरफ धुआं निकल रहा है। आग की लपटें दूसरी मंजिल से उठ रही थीं।
आग को देखकर मो. लाडले दौड़कर भागे लेकिन उसके साथ कमरे में रहने वाले कुछ लोग आग की चपेट में आ गए। हादसे में लाडले का मोबाइल फोन भी वहीं छूट गया था जो खाक हो गया। महज पांच मिनट के अंदर आग की लपटें इतनी विकराल हो गई कि इसकी चपेट में कई लोग आ गए।
पुलिस के साथ गया एक मृतक का भाई गायब, लोग गुस्साए
अनाज मंडी के हादसे में बिहार के मूल निवासी राजू की भी मौत हो गई। सोमवार को राजू के साथी लोकनायक अस्पताल की मोर्चरी के बाहर काफी गुस्से में थे। पूछताछ में पता चला कि रविवार शाम सदर थाना पुलिस राजू के भाई दुलारे को साथ ले गई है। तब से सोमवार शाम 4 बजे तक दुलारे का कोई अता-पता नहीं है। पुलिस भी उन्हें कुछ नहीं बता रही। उधर, दुलारे की मौजूदगी के बगैर राजू का पोस्टमार्टम करने से भी इनकार कर दिया है।
मोहम्मद करीम ने बताया कि वे बिहार के मुजफ्फरपुर निवासी हैं। उनके गांव के ही बबलू, राजू और तौफीक की मौत हो चुकी है। रविवार शाम करीब 5 बजे वे अपने साथियों और दुलारे के साथ मोर्चरी पर ही थे। सादे कपड़ों में कुछ लोग आए और कहा कि वे सदर पुलिस थाने से हैं और कुछ बात करना चाहते हैं। धीरे-धीरे बात करते हुए वे दुलारे को आगे तक ले गए और फिर जीप में बैठाकर ले गए। साथी पीछे दौड़े तो पुलिसवालों ने कहा कि वे उसे छोड़ देंगे।
सोमवार शाम तक भी दुलारे का अता-पता नहीं है। वे मोर्चरी के आगे बेबस खड़े हैं। तौफीक और बबलू का पोस्टमार्टम हो चुका है, लेकिन वे साथ ही राजू का शव भी ले जाना चाहते हैं। मोर्चरी में पुलिस कह रही है कि जब तक राजू के परिवार से कोई नहीं आएगा, तब तक पोस्टमार्टम नहीं होगा। राजू के घर में बुजुर्ग मां-बाप हैं। उन्हें इतनी जल्दी दिल्ली बुलाना भी संभव नहीं है। दुलारे और राजू दोनों सगे भाई थे और मजदूरी करते थे। दुलारे दिल्ली के बाड़ा हिंदूराव इलाके में नौकरी करता है। राजू अनाज मंडी स्थित फैक्टरी में टोपी बनाने का काम करता था।
उधर, इन आरोपों के संबंध में सदर थाने के एसएचओ से बातचीत की गई तो उन्होंने दुलारे नाम के किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने से इनकार कर दिया। ऐसे में बड़ा सवाल है कि दुलारे कहां लापता हो गया? मोर्चरी में उसने भाई राजू और गांव के ही तौफीक के शव की शिनाख्त भी की थी। सादे कपड़ों में आए कथित पुलिसवाले कौन थे? ऐसे तमाम सवालों को लेकर दिनभर करीम और उनके साथी मीडिया और पुलिस से जवाब मांगते रहे।