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केस हारी सरकार पर नहीं दिए 32 साल पुराने प्लॉट

Tue, 12 Jan 2016 06:59 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 12 Jan 2016 06:59 AM IST
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allotted plots befor 32 years but dont get Possession

हाईकोर्ट से लेकर सर्वोच्च न्यायालय में भी मुकदमा हारने के बावजूद दिल्ली सरकार 32 वर्ष पूर्व 20 सूत्री कार्यक्रम के तहत आर्थिक रूप से कमजोर व पिछड़े वर्ग के लोगों को आवंटित प्लॉट नहीं दे रही। हाईकोर्ट ने इसे सरासर अदालत की अवमानना का मामला करार दिया। अदालत ने दिल्ली सरकार मुख्य सचिव, निदेशक पंचायत (अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट) सहित दो को अदालत की अवमानना के आरोप में प्रथम दृष्टया दोषी ठहरा दिया है।

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मुख्य न्यायाधीश जी.रोहिणी व न्यायमूर्ति जयंत नाथ की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि सरकार ने करीब 32 वर्ष पूर्व गरीब तबके को संरक्षण प्रदान करने के लिए यह योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत आर्थिक रूप से कमजोर व पिछड़े वर्ग के लोगों को 20 अक्तूबर 1983 को 120-120 गज के प्लॉट आवंटित कर किए, समारोह में सभी को कब्जा पत्र दिए गए।
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खंडपीठ ने पूरे मामले में आश्चर्य जताते हुए कहा कि सिंगल जज ने 31 अक्तूबर 2011 को दिल्ली सरकार प्रशासन को फटकार लगाते हुए सरकार को पूरे मामले की जांच करवाने व सभी याचिकाकर्ताओं को प्लाट का कब्जा देने का निर्देश दिया था।
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अदालत ने कहा इसके बाद सरकार ने खंडपीठ के समक्ष अपील की लेकिन खंडपीठ ने 13 जुलाई 2012 को अपील खारिज कर दी। इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा व अदालत ने 15 जनवरी 2013 को अपील खारिज करते हुए सरकार पर ढाई लाख रुपये जुर्माना करते हुए अदालत की अवमानना का मामला मानते हुए इस अदालत के समक्ष मामला भेज दिया।

खंडपीठ ने कहा कि राजनेता राजनीतिक फायदा उठाने के लिए इस प्रकार के काम करते है और जीतने के बाद भूल जाते है। खंडपीठ ने कहा कि सभी तथ्यों व साक्ष्यों को देखने के बाद वे महसूस करते है कि सरकार को कानूनी तौर पर ही नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के तहत अपनी बचनबद्धता का पालन करना चाहिए।

खंडपीठ ने कहा कि बार-बार कहने के बावजूद सरकार प्लाट देने में असफल रही है और भूमि की तलाश तक नहीं की गई। स्पष्ट है कि जानबूझ कर अदालत के आदेश की अवहेलना की जा रही है। खंडपीठ ने कहा कि सभी तथ्यों को देखने के बाद वे मुख्य सचिव, निदेशक पंचायत, ब्लाक विकास अधिकारी महरोली, गांव सभा बीडीओ महरोली को प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना के दोषी है।

खंडपीठ ने रजिस्ट्रार जनरल को इन सभी के खिलाफ कार्रवाई के लिए मामले को संबंधित अदालत के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया है।

क्या है मामला-
याची के अधिवक्ता आर.के.सैनी ने अदालत को बताया कि सरकार ने 20 सूत्री कार्यक्रम के तहत भूमिहीनों के पुनर्वास की योजना बनाई थी। इसी के तहत 20 नवंबर 83 को तत्कालीन रंगपुरी गांव में याचीनारायण सिंह सहित 173 भूमिहीनों को 120 गज के प्लॉट आवंटित कर दिए। इतना ही नहीं गांव के प्रधान ने प्रेम सिंह ने वर्ष 86 में तत्कालीन सांसद भरत सिंह की उपस्थिति में समारोह आयोजित कर कब्जा पत्र भी बांट दिए।


उन्होंने कहा वर्ष 1993 तक गांव के उच्च वर्ग के दबाव के इन लोगों को प्लाट पर कब्जा नहीं होने दिया गया और पुलिस ने भी छूठे केस में इन लोगों को गिरफ्तार कर लिया। आखिर जब इन्होंने मजिस्ट्रेट को प्लाट के दस्तावेज दिखाए तो अदालत ने इन को बरी किया। उन्होंने सरकार व प्रशासन भी उच्च वर्ग के दबाव में खामोश है आखिर उनके 96 मुवक्किलों को अदालत में आना पड़ा। उन्होंने कहा वोट बैंक के नाते ही पहले प्लाट दिए गए, मगर अब कब्जा नहीं दिया जा रहा है और वे 32 वर्ष से सड़क पर है। अत: प्लाट का कब्जा दिलवाया जाए।

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