सचेत हो जाएं: नहीं तो दो दशक बाद हर दूसरा बच्चा हो सकता है मायोपिया का शिकार, पीएम भी जाहिर कर चुके चिंता
बच्चों में बढ़ती मायोपिया की समस्या को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हालिया परीक्षा पे चर्चा कार्यक्रम में चिंता जाहिर की थी। एम्स के आरपी सेंटर के प्रमुख डॉ. डॉ. जीवन एस टिटियाल के मुताबिक, देश के बच्चों में मायोपिया खतरनाक रूप से बढ़ रहा है।
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स्मार्टफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के बढ़ते प्रचलन से बच्चों में निकटदृष्टि दोष (मायोपिया) के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार, यदि जल्द सचेत नहीं हुए तो दो दशक बाद देश में हर दूसरा बच्चा मायोपिया का शिकार हो सकता है। बच्चों में बढ़ती मायोपिया की समस्या को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हालिया परीक्षा पे चर्चा कार्यक्रम में चिंता जाहिर की थी।
वहीं इसे लेकर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली में डॉ राजेंद्र प्रसाद नेत्र विज्ञान केंद्र के डॉक्टरों ने बीते वर्ष एक अध्ययन पबमेड/मेडलाइन में प्रकाशित किया था, जिसमें दावा किया गया है कि यदि मायोपिया के मामले इसी गति से बढ़ते रहे तो 2050 तक 50 फीसदी बच्चे इसके शिकार हो सकते हैं। सुझाव दिया गया है कि सरकार इसे लेकर नीति बनाए।
बता दें कि मायोपिया बच्चों में एक स्थिति, जिसमें पास की वस्तुएं साफ दिखाई देती हैं, लेकिन दूर की नहीं। एम्स के आरपी सेंटर के प्रमुख डॉ. डॉ. जीवन एस टिटियाल के मुताबिक, देश के बच्चों में मायोपिया खतरनाक रूप से बढ़ रहा है। साल 2045-50 तक 40 से 50 फीसदी बच्चों में मायोपिया होने का खतरा बना हुआ है। इसके सुधारात्मक उपायों को लागू करने की आवश्कता है। इसकी रोकथाम के लिए बड़े स्तर पर स्कूलों व अन्य जगहों पर कैंप लगाकर मायोपिया या निकट दृष्टि दोष की जांच करने की जरूरत है। माता-पिता भी बच्चों से बातचीत कर इसके लक्षण का पता लगा सकते हैं। यदि बच्चे को ब्लैकबोर्ड स्पष्ट नहीं दिखता, पास से टेलीविजन देखने में दिक्कत होती है तो उन्हें तुरंत जांच करवानी चाहिए।
इन डॉक्टरों ने किया अध्ययन
एम्स के नेत्र विज्ञान विभाग के वरिष्ठ डॉक्टर अमर पुजारी, डॉ. सुजीत मोदाबोयना, डॉ. दिव्या अग्रवाल, डॉ. गुंजन सलूजा, डॉ. राजेश्वरी थंगावेल, डॉ. वैशाली रखेजा, डॉ. रोहित सक्सेना, डॉ. नम्रता शर्मा, डॉ. जीवन एस टिटियाल, और डॉ. अतुल कुमार ने भारत ने मायोपिया विषय पर अध्ययन किया था।
गांवों में भी बढ़ रहे मामले
स्मार्टफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के बढ़ते इस्तेमाल के कारण मायोपिया के मामले शहरों के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी तेजी से बढ़ रहे हैं। दिल्ली जैसे मेट्रो शहर में करीब 13-15 फीसदी बच्चे मायोपिया के शिकार हैं। इन्हें चश्मा लगाने की जरूरत है। कोरोना महामारी के बाद स्कूलों में 10 से 15 साल के बच्चों में मायोपिया के मामले 7 से 8 फीसदी से बढ़कर 13 से 18 फीसदी तक हो गया है।
आनुवांशिक है समस्या
डॉक्टरों की माने तो आनुवांशिक होने के कारण मायोपिया की समस्या बढ़ रही है। अगर माता-पिता इस विकार से पीड़ित हैं तो निकट दृष्टिदोष का जोखिम बच्चों में 30 फीसदी तक बढ़ जाता है। माता-पिता यदि पीड़ित हैं तो पांच से 15 साल के आयु के बच्चों की जांच की जानी चाहिए। बच्चों को नेत्र रोग विशेषज्ञ से नियमित रूप से आंखों की जांच कराने की जरूरत है।
बचाव के लिए क्या करें
- अच्छी रोशनी वाले कमरों में करें पढ़ाई
- लेट कर पढ़ने से बचें।
- स्मार्टफोन का इस्तेमाल कम करें
- लंबे समय तक फिल्म या पढ़ने से बचे
- स्कूल में एक पीरियड आउट डोर का हो
- सामान्य खाने पर ध्यान देना चाहिए
बचाव के लिए करें
पास का काम करने के दौरान 20 मिनट काम के बाद लें 20 सेकंड का ब्रेक।
दवाओं को लेकर चल रहा अध्ययन
डॉ. टिटियाल ने कहा कि मायोपिया की रोकथाम के लिए दवाइयों पर अध्ययन किया जा रहा है। पांच से 15 साल के बच्चों को दवाएं दी जा रही है। इनके असर से मायोपिया जिस स्थिति में है वह वहीं रुक जाता है। आने वाले दिनों में इसमें और स्पष्टता आने की उम्मीद है।