एम्स ने विश्व में सबसे पहले इजाद की ये तकनीक
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दो या दो से अधिक दवा के बाद भी मिरगी के दौरे बंद न होना और दिमाग के एक ही तरफ से दौरे पड़ने वाले मरीजों (ड्रग रिजिस्टन्ट एपलेप्सी) को अब बड़े ऑपरेशन की जरूरत नहीं पड़ेगी।
एम्स के डॉक्टरों ने एन्डोस्कोपिक असिस्टड मिनिमली इन्वेसिव हेमिस्फिरटॉमी नामक तकनीक (सर्जिकल तकनीक) इजात की है। इस तकनीक से दिमाग के खराब हिस्से को अलग कर दिया जाता है।
खास बात यह है कि वर्ष 2013 से अब तक एम्स के डॉक्टरों ने पंद्रह बच्चों पर प्रयोग सर्जिकल तकनीक में सफलता पायी है। यहीं नहीं, एम्स के डॉक्टरों के इस कीर्तिमान को यूएसए के न्यूरोसर्जरी जरनल में भी जगह मिल चुकी है।
विश्व में पहली बार हुई है ये सर्जिकल तकनीक
एम्स के डिपार्टमेंट ऑफ न्यूरोसर्जरी के प्रोफेसर डॉ. पी शरत चंद्रा के मुताबिक, मिरगी के मरीजों के यूं तो कई प्रकार के आपरेशन होते हैं। लेकिन यह सर्जिकल तकनीक ड्रग रजिस्टेंट एपलेप्सी टाइप (इसमें चार से दस आयु वर्ग के मरीज को लिया जाता है) मरीजों के लिए विश्व में पहली बार इजात की गयी है।
यह मिरगी के मरीजों का ऐसा वर्ग है, जिनकी दवा या सामान्य आपरेशन से बीमारी ठीक नहीं होती है। क्योंकि उनके ब्रेन के आधे हिस्से की कोशिकाओं (न्यूरॉन) का आधा हिस्सा खराब हो चुका होता है और जिससे ब्रेन के दूसरे हिस्से पर भी फर्क पड़ता है।
अभी तक ऐसे मरीजों के लिए बड़ा आपरेशन होता था, जिसमें सिर पर दस से पंद्रह सेंटीमीटर तक का कट लगता था और करीब 15 घंटे तक का समय लगता था। लंबा ऑपरेशन चलने के चलते मरीज को अत्यधिक रक्त स्राव, इंफेक्शन समेत कई अन्य दिक्कतों का सामना करना पड़ता था।
ऐसे होगा मिरगी का इलाज
डॉ. चंद्रा के मुताबिक, वर्ष 2013 में एम्स में सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद इस सर्जिकल तकनीक को इजात किया था। सबसे पहले पांच मरीजों पर सफलता मिली और मई 2015 तक कुल पंद्रह मरीजों पर सफलता हासिल की जा चुकी है।
इसके माध्यम से महज तीन से चार घंटों में ब्रेन के खराब हिस्से को कॉर्पस कलोसम से अलग कर दिया जाता है। इससे मरीज को मिरगी के दौरे आने बंद हो जाते हैं। इस नई तकनीक से मरीज पांच से छह दिनों में ठीक हो जाता है। डॉ. चंद्रा के मुताबिक, उन्होंने जिन पंद्रह मरीजों पर इस नई सर्जिकल तकनीक से इलाज किया है, उसमें 18 आयु वर्ग का युवक भी शामिल है।
वहीं, डिपार्टमेंट ऑफ न्यूरोलॉजी की प्रोफेसर मंजरी त्रिपाठी के मुताबिक, यूं तो मिरगी के मरीजों के कई प्रकार से ऑपरेशन किए जाते हैं लेकिन यह सर्जिकल तकनीक मिरगी के उन मरीजों के लिए हैं, जिन्हें दो या दो से अधिक दवा देने के बाद भी दौरे बंद नहीं होते हैं और जिन मरीजों को दौरे दिमाग के एक ही साइड से पड़ते हैं, के लिए है।
इस मौके पर डिपार्टमेंट ऑफ न्यूरोसर्जरी के हेड प्रो. बीएस शर्मा के मुताबिक, एम्स ने ड्रग रिजिस्टन्ट एपलेप्सी मरीजों के लिए एक नया कीर्तिमान रचा है, जोकि बधाई के पात्र हैं।