नेत्रदान में कठिनाई: कोरोना से मरने वालों की आंखों में वायरस का पता लगा रहा दिल्ली एम्स
एम्स आरपी सेंटर के प्रमुख डॉ. जेएस तितियाल का कहना है कि दुनिया में अभी तक कहीं भी कॉर्निया में कोरोना वायरस का पता चलने की पुष्टि नहीं हुई है लेकिन एहतियात के तौर पर दिशा निर्देशों में कोरोना संक्रमित मृतक का नेत्रदान मान्य नहीं है।
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कोरोना संक्रमण की वजह से मरने वालों की आंखें दान में नहीं ली जा रही हैं। चिकित्सीय तौर पर इन आंखों को प्रत्यारोपण के लिए उचित नहीं माना जा रहा है लेकिन इससे कॉर्निया प्रत्यारोपण को लेकर भी कठिनाई हो रही है। इसीलिए नई दिल्ली स्थित एम्स के डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेत्रविज्ञान संस्थान (आरपी सेंटर) के डॉक्टरों ने कोरोना मृतकों की आंखों की जांच करना शुरू कर दिया है। इसके लिए डॉक्टरों ने पांच मृतकों से आंखें ली हैं और अब इनकी जांच की जा रही है। ताकि यह पता चल सके कि क्या वाकई में कोरोना वायरस की वजह से आंखों को नुकसान होता है।
एम्स आरपी सेंटर के प्रमुख डॉ. जेएस तितियाल का कहना है कि दुनिया में अभी तक कहीं भी कॉर्निया में कोरोना वायरस का पता चलने की पुष्टि नहीं हुई है लेकिन एहतियात के तौर पर दिशा निर्देशों में कोरोना संक्रमित मृतक का नेत्रदान मान्य नहीं है। वहीं डॉ. नम्रता ने बताया कि इस समय दो अलग अलग चिकित्सीय अध्ययन शुरू हो चुके हैं।
यह दोनों अध्ययन एक दूसरे से काफी जुड़े हुए हैं। एक अध्ययन में आंख के हर हिस्से की जांच की जा रही है ताकि यह पता चले कि कोरोना वायरस किस हिस्से को प्रभावित करता है। इसमें रैटिना और ऑप्टिक नर्व इत्यादि शामिल हैं। जबकि दूसरे चिकित्सीय अध्ययन में कॉर्निया पर कोरोना वायरस के प्रभाव की जांच हो रही है। अगर इस अध्ययन में वायरस की पुष्टि नहीं होती है तो यह संभव है कि आगामी दिनों में कोरोना से मरने वालों का नेत्रदान किया जा सके।
डॉ. तितियाल ने बताया कि कोरोना संक्रमण से मरने वालों की आंखों को प्रत्यारोपण में शामिल नहीं किया जा सकता है। आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2020 से जुलाई 2021 के बीच 5.50 फीसदी यानी 24 कोरोना मृतकों की आंखों को प्रत्यारोपण में शामिल नहीं किया जा सका। उन्होंने बताया कि जब कोई नेत्रदाता मिलता था तो पहले उसकी कोरोना जांच कराई जाती थी।
रिपोर्ट संक्रमित मिलने पर उसकी आंखें दान में नहीं ले सकते थे लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ कि नेत्रदान के बाद मृतक के कोरोना संक्रमित होने का पता चला। ऐसे 5.50 फीसदी मामले एम्स में देखने को मिले जिन्हें कॉर्निया प्रत्यारोपण में शामिल नहीं किया गया लेकिन उन्हें चिकित्सीय अध्ययन में जरूर शामिल किया गया है।