नोटबंदी के बाद आधुनिक युग में भाने लगी है पुरानी परंपरा, इसी से हो रहा नकदी का इंतजाम
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दरअसल, हिंदू समाज में बेटियों की शादी में समाज के लोगों को बुलाया जाता है और जो भी शादी में शामिल होता है वह लड़की को बतौर आर्शीवाद एक शगुन देता है। जो बेटी की विदाई के दौरान बेटी का पिता कन्यादान के रूप में वर पक्ष को देता है।
दशकों पुरानी यह परंपरा इन दिनों लोगों को बेहद पसंद आ रही है। चूंकि जो भी रिश्तेदार और समाज के लोग हैं वह इस शगुन को नए नोट के रूप में दे रहे हैं। इससे शादियों में बेटी के कन्यादान की रस्म पूरी हो रही है। नए नोट शादी में सिर्फ शगुन के काम ही लिए जा रहे हैं। अब शादियों में कार और अन्य सामान का दिखावा बंद हो रहा है।
फिजूलखर्ची पर लगी रोक
ग्रेनो के डेल्टा दो निवासी कर्मवीर सिंह ने अपनी बेटी की शादी 21 नवंबर को की है। शादी में फर्नीचर से लेकर इलेक्ट्रानिक सामान देने के लिए उन्होंने बेटी को चेक से रकम दी है। इसके अलावा बेटी के कन्यादान में कार के नाम पर भी चेक देकर ही काम चलाया है। जबकि नोट बंदी न होती तो वह सारा सामान खरीदकर ही देते।
बिरौंडी के बुजुर्ग राजपाल महाशय बताते हैं कि कन्यादान की परंपरा करीब 5 दशक पुरानी है और यह बेटी की शादी में मदद करने की परंपरा थी। मगर आज नए नोट न मिलने के कारण यह रस्म शादी वाले परिवारों के लिए रामबाण साबित हो रही है।
1000 और 500 के नोट बंद होने से भले ही लोगों को परेशानी हो रही है। मगर यह बात भी सही है कि लोगों ने पिछले 14 दिन से फिजूलखर्ची पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। शादियों में आतिशबाजी बंद हो गई और अधिक बैंड बाजे भी नहीं आ रहे हैं। सजावट आदि के लिए मोटी रकम खर्च की जाती थी मगर अब उसे भी कम दिया है।