इमारत ढहते ही भाग निकले आसपास के प्रॉपर्टी डीलर, प्रशासन की मिलीभगत से बन रहीं जानलेवा इमारतें
कोर्ट के आदेश पर शाहबेरी की जमीन अधिग्रहण से मुक्त हो गई। किसानों को जमीन वापस होते ही तमाम कालोनाइजर सक्रिय हो गए। किसानों से जमीन खरीदकर पांच से छह मंजिला भवन बनाकर फ्लैट बेचने का धंधा बना लिया।
बिल्डरों के साथ ही दलाली करने के लिए तमाम प्रॉपर्टी डीलर सक्रिय हो गए। एक तरफ जहां सोसाइटियों में टू बीएचके फ्लैट की कीमत 35 से 40 लाख रुपये होती है, वहीं उनसे सटे गांवों में टू बीएचके फ्लैट 22 से 23 लाख रुपये में मिल जाते हैं। कम कीमत की लालच में लोग खरीद लेते हैं।
प्रॉपर्टी डीलर चौडी सड़क, सीवर, 24 घंटे बिजली और जल्द कब्जा दिलाने का दावा कर इन फ्लैटों को बेच देते हैं। इनके लिए वे सड़क के दोनों ओर बैठेर हते हैं। हालांकि मंगलवार को इमारत ढहने के बाद बुधवार को नजर अलग ही दिखा।
प्रॉपर्टी डीलर सड़क से अपने टेंट और बोर्ड भी हटा दिए गए है। वहीं जिन बिल्डरों ने निर्माण कार्य चल रहे थे उनमें मौजूद श्रमिकों को तीन से चार माह के लिए छुट्टी कर भेज दिया गया है। काम बंद कर दिए गए है। भवनों को किसके द्वारा बनाया जा रहा है, इसकी जानकारी देने वाला भी कोई नजर नहीं आया।
प्राधिकरण, पुलिस व रजिस्ट्री विभाग की मिलीभगत से बन रहीं अवैध इमारतें
ग्रेटर नोएडा के गांवों की आबादी पर अनिधिकृत फ्लैट बनाने वालों के हौंसले ऐसे ही नहीं बुलंद हैं, बल्कि प्राधिकरण, रजिस्ट्री विभाग व पुलिस को सुविधा शुल्क पहुंचाकर धड़ल्ले से बनाते हैं। इन विभागों को प्रति फ्लैट के हिसाब से पैसा पहुंचाया जाता है।
सूत्र बताते हैं कि जमीन पर निर्माण शुरू करने से पहले ही प्राधिकरण के अधिकारियों को अपने पक्ष में कर लिया जाता है। उनको कुछ चढ़ावा दे दिया जाता है। जिस एरिया में फ्लैट बनाने होते हैं वहां के सर्किल इंचार्ज व फील्ड में रहने वाले इंजीनियर से सौदा कर लिया जाता है।
वे भी चार-पांच माह चुप रहते हैं। इतने में फ्लैट बनकर तैयार हो जाता है। उसके बाद निर्माण शुरू होते ही पुलिस भी पहुंच जाती है। उनको भी सुविधा शुल्क दे दिया जाता है। रजिस्ट्री विभाग की टीम भी सक्रिय रहती है। उसको भी पता रहता है कि कहां पर फ्लैट बन रहे हैं।
वहां भी पैसे पहुंचाने होते हैं। रजिस्ट्री विभाग का सुविधा शुल्क तय है। फ्लैटों की रजिस्ट्री करने के लिए 20 हजार रुपये की सुविधा शुल्क देकर दादरी तहसील के सब रजिस्ट्रार दफ्तर में रजिस्ट्री कर दी जाती है।
प्राधिकरण व पुलिस से बातचीत कर सुविधा शुल्क तय कर लिया जाता है। सूत्र बताते हैं कि भवन में सस्ती दरों पर फ्लैट का बाकायदा प्रचार-प्रसार भी होता है। प्रशासन को भी इसकी जानकारी होती है। मात्र चार से पांच माह में फ्लैट बनकर तैयार हो जाते हैं।
निजी फाइनेंसर बैंक लोन भी देने को तैयार बैठे रहते हैं। उनसे भी पहले ही सेटिंग कर ली जाती है। हालांकि सहायक स्टांप आयुक्त अखिलेश दूबे का कहना है कि इस तरह की अभी कोई शिकायत नहीं मिली है अगर शिकायत मिलती है तो उस पर कार्रवाई की जाएगी।