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गाजियाबाद को रंगेगा 10 करोड़ का अबीर
अमर उजाला, गाजियाबाद
Updated Wed, 12 Mar 2014 11:45 PM IST
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होली नजदीक है और बाजार रंगीन हो गया है। पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी के फुलबारीगंज से आए अबीर की महक महानगर के बाजारों में महसूस होने लगी है।
इसके अलावा उत्तर प्रदेश के हाथरस और मथुरा से भी रंगों की सप्लाई महानगर में की जा रही है। थोक बाजार तुराब नगर, घंटाघर, मालीवाड़ा के अलावा फुटकर बाजार से 10 करोड़ रुपये के रंग और गुलाल बिकने की संभावना कारोबारी जता रहे हैं।
होली नजदीक आने के साथ ही रंग कारोबार में तेजी आ गई है। इस बार लोकसभा चुनाव है तो होली भी चुनावी होगी। चुनावी होली मिलन समारोह के आयोजनों में खूब अबीर-गुलाल उडे़गा।
सोसायटी के पार्कों में होने वाले कार्यक्रमों में भी गुलाल उड़ाया जाता है। ऐसे में होली पर गाजियाबाद में 150 से 200 टन रंग और गुलाल की खपत होने का अनुमान है।
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मालीवाड़ा के रंग कारोबारी पंकज ने बताया कि लोग अब रंगों के बजाए गुलाल से होली खेलना ज्यादा पसंद करते हैं। गुलाल में भी लोग प्योर और हर्बल गुलाल की डिमांड करते हैं।
हर्बल गुलाल महंगा होता है पर हानिकारक नहीं होता है। उन्होंने बताया कि हापुड़ और बुलंदशहर में भी सप्लाई गाजियाबाद से की जा रही है।
वायु प्रदूषण झेलेगा महानगर
होली पर बड़ी मात्रा में उड़ने वाले केमिकल युक्त गुलाल शहर की फिजा बिगाड़ेंगे। पर्यावरणविद् विजयपाल बघेल ने बताया कि पहले ही गाजियाबाद देश के अन्य शहरों के मुताबिक देश के अन्य शहरों से 300 गुना अधिक प्रदूषित है। ऐसे में गुलाल से हवा जहरीली होगी।
रंग-गुलाल सेहत पर भारी
बाजार में मिलने वाले सस्ते चाइनीज रंग-गुलाल त्वचा के साथ-साथ आंखों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। त्वचा रोग विशेषज्ञ डा. राहुल चौधरी ने बताया कि केमिकल के साथ-साथ डिटरजेंट और रेत मिलाकर भी गुलाल तैयार किया जाने लगा है जो न सिर्फ स्किन बल्कि आंखों, सांस की नली और बालों के लिए भी खतरनाक साबित होते हैं।
हैवी मैटेल से त्वचा में रैशेज आ जाते हैं। सीनियर आई स्पेशलिस्ट डा. संजय तेवतिया ने बताया कि कि होली पर ज्यादातर लोग पक्का रंग लगाने में ही विश्वास रखते हैं। कई बार इसके लिए ऐसे रंग भी इस्तेमाल कर लिए जाते हैं जो आंखों के टेंपररी ब्लाइंडनेस का कारण भी बन सकते हैं।
हैवी मेटल त्वचा पर एक जैसा ही असर करते हैं, जिससे त्वचा में एलर्जी होने के साथ रैशेज आ सकते हैं। इसके साथ ही होली पर वातावरण में उड़ने वाले गुलाल स्वांस रोगियों के लिए आफत बन सकता है। ब्रान्काइटिस और अस्थमा के रोगियों को अबीर और गुलाल की वजह से सांस लेने में परेशानी हो सकती है।
फिजिशियन डा. विनीत अग्रवाल ने बताया कि सूखे गुलाल में सिलिका आदि केमिकल की मिलावट होती है जो स्वांस नली में संक्रमण पैदा करती है। इससे अस्थमा और ब्रान्काइटिस के मरीजों को सांस लेने में परेशानी होती है।
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इसके अलावा उत्तर प्रदेश के हाथरस और मथुरा से भी रंगों की सप्लाई महानगर में की जा रही है। थोक बाजार तुराब नगर, घंटाघर, मालीवाड़ा के अलावा फुटकर बाजार से 10 करोड़ रुपये के रंग और गुलाल बिकने की संभावना कारोबारी जता रहे हैं।
होली नजदीक आने के साथ ही रंग कारोबार में तेजी आ गई है। इस बार लोकसभा चुनाव है तो होली भी चुनावी होगी। चुनावी होली मिलन समारोह के आयोजनों में खूब अबीर-गुलाल उडे़गा।
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सोसायटी के पार्कों में होने वाले कार्यक्रमों में भी गुलाल उड़ाया जाता है। ऐसे में होली पर गाजियाबाद में 150 से 200 टन रंग और गुलाल की खपत होने का अनुमान है।
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मालीवाड़ा के रंग कारोबारी पंकज ने बताया कि लोग अब रंगों के बजाए गुलाल से होली खेलना ज्यादा पसंद करते हैं। गुलाल में भी लोग प्योर और हर्बल गुलाल की डिमांड करते हैं।
हर्बल गुलाल महंगा होता है पर हानिकारक नहीं होता है। उन्होंने बताया कि हापुड़ और बुलंदशहर में भी सप्लाई गाजियाबाद से की जा रही है।
वायु प्रदूषण झेलेगा महानगर
होली पर बड़ी मात्रा में उड़ने वाले केमिकल युक्त गुलाल शहर की फिजा बिगाड़ेंगे। पर्यावरणविद् विजयपाल बघेल ने बताया कि पहले ही गाजियाबाद देश के अन्य शहरों के मुताबिक देश के अन्य शहरों से 300 गुना अधिक प्रदूषित है। ऐसे में गुलाल से हवा जहरीली होगी।
रंग-गुलाल सेहत पर भारी
बाजार में मिलने वाले सस्ते चाइनीज रंग-गुलाल त्वचा के साथ-साथ आंखों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। त्वचा रोग विशेषज्ञ डा. राहुल चौधरी ने बताया कि केमिकल के साथ-साथ डिटरजेंट और रेत मिलाकर भी गुलाल तैयार किया जाने लगा है जो न सिर्फ स्किन बल्कि आंखों, सांस की नली और बालों के लिए भी खतरनाक साबित होते हैं।
हैवी मैटेल से त्वचा में रैशेज आ जाते हैं। सीनियर आई स्पेशलिस्ट डा. संजय तेवतिया ने बताया कि कि होली पर ज्यादातर लोग पक्का रंग लगाने में ही विश्वास रखते हैं। कई बार इसके लिए ऐसे रंग भी इस्तेमाल कर लिए जाते हैं जो आंखों के टेंपररी ब्लाइंडनेस का कारण भी बन सकते हैं।
हैवी मेटल त्वचा पर एक जैसा ही असर करते हैं, जिससे त्वचा में एलर्जी होने के साथ रैशेज आ सकते हैं। इसके साथ ही होली पर वातावरण में उड़ने वाले गुलाल स्वांस रोगियों के लिए आफत बन सकता है। ब्रान्काइटिस और अस्थमा के रोगियों को अबीर और गुलाल की वजह से सांस लेने में परेशानी हो सकती है।
फिजिशियन डा. विनीत अग्रवाल ने बताया कि सूखे गुलाल में सिलिका आदि केमिकल की मिलावट होती है जो स्वांस नली में संक्रमण पैदा करती है। इससे अस्थमा और ब्रान्काइटिस के मरीजों को सांस लेने में परेशानी होती है।