थमा नहीं बढ़ गया है AAP में शह-मात का खेल
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आम आदमी पार्टी (आप) में सतह पर बेशक सुलह-समझौते की कोशिशें चल रही हैं। लेकिन अंदरखाने शह-मात का सियासी खेल चल रहा है। दोनों गुट दमदारी से अपनी चाल चल रहे हैं। नजर राष्ट्रीय परिषद की बैठक पर है।
सूत्रों की मानें तो मंगलवार रात राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) के फैसले भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। इनके जरिये टीम केजरीवाल की कोशिश राष्ट्रीय परिषद में विरोधी गुट पर बढ़त हासिल करने की है।
दरअसल, पीएसी से निकाले जाने के बाद योगेंद्र यादव-प्रशांत भूषण खेमा कार्यकर्ताओं से सीधी बात कर रहा है। इसमें आम कार्यकर्ताओं की दुखती रग दबाई जाती है। सीधा सवाल यही होता है कि पार्टी फिलहाल उनसे संवाद कर रही है या नहीं।
मंगलवार को अरविंद केजरीवाल को भेजी गई चिट्ठी में योगेंद्र और प्रशांत भूषण ने एक बार फिर दोहराया है कि पार्टी में कार्यकर्ताओं को सम्मान मिले। दूसरे राज्यों में पार्टी विस्तार व पारदर्शिता की बात कही है।
पीएसी के फैसले भी इसी खेल का हिस्सा
दिल्ली से बाहर के राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों का सियासी वजूद अपने राज्य में पार्टी के विस्तार पर निर्भर है। सूत्र बताते हैं कि योगेंद्र यादव की नाराजगी की नींव भी हरियाणा चुनाव न लड़ने पर पड़ी। महाराष्ट्र के आप नेता मयंक गांधी के गुस्से को इसी नजर से देखा जा रहा है।
सवाल केजरीवाल के फैसले के जायज-नाजायज होने पर रहता है। इस मसले पर भी टीम केजरीवाल बैकफुट पर दिख रही थी। एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, पीएसी के दो बड़े फैसले इन मसलों को ढीला करेंगे।
कार्यकर्ताओं से बातचीत करने के लिए बनने वाली कमेटी उनकी नाराजगी दूर करने में मददगार होगी। वहीं, मिशन विस्तार से राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों के घाव पर मरहम लगेगा। खास बात यह कि राज्य विशेष में चुनाव लड़ने का फैसला उस राज्य की कमेटी को करना है। इससे पार्टी के हारने पर केजरीवाल के नेतृत्व पर भी सवाल नहीं उठेगा।